क्षितिज बनती पहाड़ी से ******************** उठ पहाड़ी दो घड़ी हम बात तो कर लें ! जब कभी भी , दृष्टियां जाती तुम्हारी ओर तब सदा तुम , क्षितिज बनकर रह …
पहाड़ों के बीच
नर्मदा की शाम ************ नीबी बंध ढीले किये पुष्प गंधी सांसें छोड़ती धारा ,टापू ,वनांगनों और विन्ध्य – सतपुड़ा की संवेदनशील घाटियों के दूरान्तगामी उतार – चढ़ाव तक रतनार नयनों …
नर्मदा की सुबह ************ कुहरे का धुमैला वस्त्र फेंककर नींद से उठी सुबह नहाने चली नर्मदा में धंसकर पानी के छींटों से अलसाये तट हड़बड़ा गये कुनमुनाकर जाग गई ठण्डी …
बेटी को ******* पिछला सबक दुहराते हुए बेटी ने पूछा — गार की रंभाहट शेर की दहाड़ सारस की क्रेंकार वगैरह तो समझ में आ गई आदमी की बोली को …
कब समझोगे विंध्याचल ? ********************** हिमालय के पक्ष में खेले गये अगस्त के उस नाटक को कब समझोगे विंध्याचल ? प्रणति मुद्रा में झुके कब सोचोगे उन ज्वारों के बारे …
वंश संक्रमण *********** मेरे परदादा ने जो वृक्ष रोपा था उसे मेरे दादा ने पाला पोसा पिताजी ने खायें उसके फल आज मेरे सामने वह सूखकर हो गया जर्जर जिसे …
ऊर्जा का संघर्ष —४ ***************** विषपायी के कण्ठ में तुम उन्मुक्त भाव से पहले ही बैठी थीं कितनी नीलवर्णी हो गई थी शिव की देह तभी से आकाश भी इसी …
ऊर्जा का संघर्ष —-३ ***************** वाक्यों शब्दों अर्थों के आपसी तनावों से मुक्त मैं स्वरों के संसार में समा गया हूं और ये भी मुझमें बैठकर ब्रह्म रन्ध्री हो गये …
