प्रिया ***** ( ३ ) आजकल तुम सभी से हंसती – बतियाती हो सभी के सुख – दुख में होती हो शरीक प्यार की वो—- व्यक्तिगत लीक कितनी फूहड़ है …
Monthly Archives
April 2025
प्रिया ***** ( २ ) यूं तो तुम नाज़नीन रही हो हमेशा से लेकिन खतरों के बीच इतनी जल्दी फन उठाए कर फुत्कारती नागिन बन जाना एक ऐसी मुद्रा है …
प्रस्तुत ******** ( २ ) धूप के माथे उठा कर धुएं की शिकने अब न जायेगी कहीं भी रोशनी बिकने अब न अन्ना बटेरों को खायेगा अब न बौनापन शिखर …
प्रिया ***** ( १ ) मैं रोज – रोज देखता हूं आदमी की मौत रोज – रोज देखता हूं आदमी की लाश पर पैदा होती भीड़ ये भीड़ सिर हिला …
प्रस्तुत ****** ( १ ) प्याले में गर्ल लिए आये थे नीलकंठ किन्तु उस समय पर थे घर भर के द्वार बन्द लिख गये दीवार पर वे रक्त से जग …
वह **** ( ९ ) वह सदा से अन्य पुरुष सर्वनाम ही रहा मध्यम ने पीसा उत्तम ने बरसाये कोड़े अब उसे —– भाव वाचक संज्ञा बनाया जा रहा प्रत्ययों …
वह ( ८ ) उसने देखा कि बड़ी बऊ के आंगन में खिल रही कली और गांव भर के उछ्ट्टे छोकरों की नीयत खराब है देखते – देखते एक दिन …
वह **** ( ७ ) वह सोचता कि जमीन का पट्टा तो उसे भी चाहिए हवा के बिना फेफड़े कहां से लेंगे ऊर्जा अन्न के बिना कहां से मिटेगी भूख …
