Home आज की कवितावह-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

वह-तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
वह
( ८ )
उसने देखा कि बड़ी बऊ के
आंगन में खिल रही कली
और गांव भर के
उछ्ट्टे छोकरों की नीयत खराब है
देखते – देखते एक दिन मुरझाई
और खाक में मिल गई कली
शाम होते – होते पूरा गांव
आ गया दहशत की चपेट में
उसने यह भी देखा ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-“तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” से उद्धृत )
आज की कविता संकेत में समाज के यथार्थ को व्यक्त कर रही है । वर्तमान समाज इतना मर्यादा विहीन हो चुका है कि समाज में बेटी ,बहन और बहू ही नहीं वरन स्त्री जाति में कोई भी रिश्ता हो ,कोई भी जन हो समाज के शोहदे वहां ता – झांक करते ही हैं ।वह किसी भी तरह सुरक्षित नहीं रह पाती ।समाज के बीच रहते हुए किसान ने भय ,आशंका, आग ,फसल की बरबादी सब को महसूस किया । यहां कली उस नवयुवती के संदर्भ में है जो अभी किशोरी है लेकिन गली मोहल्ले छोकरों से वह सुरक्षित नहीं है ।यह उच्छृंखल युवा भी समाज के ही हिस्से हैं ।जब समाज दिशाहीन होगा तब ऐसे मर्यादा तोड़ते दृश्य समाज में आम होंगे ही ।समाज की दिशाहीन मर्यादा का भय हर चेतना सम्पन्न व्यक्ति को चिन्तित और भयभीत कर ही देगा । समाज में स्त्री के अस्तित्व पर बहुत तरह के संकट मंडरा रहे हैं उन्हीं में एक संकट है बलात्कार ,जबरदस्ती , बहकाना ,प्रेम जाल में फुसलाना , आदि यहां इन तरीकों पर बात नहीं वरन चिन्ता कुल होने का यह विषय है कि समाज इतना ज्यादा पिशाची ,अमानवीय वृत्तियों का हो गया कि स्त्री की गरिमा छिन्न भिन्न हो चुकी है ।उसका सम्मान सड़कों पर लूटा जा रहा है ।इन हादसों से गुजरकर नव युवतियों को मौत को ही गले लगाना पड़ता है ।समाज का भरोसा चूर – चूर हो रहा है ।समाज में बदनीयत का चलन इस कदर बढ़ गया कि आदमी अब शराफत या सज्जनता की मिसाल को खोज रहा है । आधुनिकता सर पर चढ़ चुकी है ।हमारे मानवीय मूल्यों को हादसों की भेंट चढ़ाया जा रहा है ।एक युवती की मौत पूरे गांव को सन्न कर देती है ।दहशत का अहसास हर समाज वासी को भयभीत कर सकता है । जिसमें समाज के प्रति चेतना ,संवेदना और सहानुभूति हो वह हर व्यक्ति आसन्न संकटों के स्वर को सुन और समझ सकता है । यहां यह विचारणीय है कि इस समय समाज सम्प्रदायिकता से भ्रमित है इसीलिए वह छोकरों में भी अपराध को जातिगत आधार पर विभाजित करके देख रहा है ।जबकि यह समग्र समाज की चिन्ता और विचार का मसला है । उच्छृंखल विचार वह चाहे किसी भी समाज और व्यक्ति , व्यवस्था,सम्प्रदाय से आयें वे हर अवस्था में अक्षम्य ही होते हैं । आधुनिक समाज एक गहरे संक्रमण से गुजर रहा है जहां स्त्री के सभी रुप संकट में ही जीवन व्यतीत कर रहे हैं? यह समाज की चिन्तित कर देने वाली स्थिति ही है ।भ्रूण हत्या ,बाल बलात्कार , महिलाओं के प्रति असम्मान भाव ,उनकी गरिमा का हनन आदि ऐसे ही प्रसंग है जिन्हें देखकर किसान जैसा संवेदनशील श्रम जीवी जो अपनी हर मेहनत का समर्पण समाज हित में करता है और जब उसके सामने इस तरह के हादसे गुजरते हैं तो दहशत से सहम जाना एक सामान्य सी बात है । समाज की गति का अहसास भय में महसूस होना एक फिक्र ,बेचैनी और संकट का ,आफत का , संशय में संकुचित कर जाना ।यह वैचारिक आवर्तन किसान की निश्चिंत दशा को हिला देता है । किसान को लेकर बार बार विचारों का आवर्तन कविता में यह जताता है कि समाज के मंगल में ,उसकी भूख का निदान करता किसान भी निरापद सहिष्णुता का निर्भय माहौल नही रच पाता ।समाज के भीतर पनपते हर संकट ,हर आशंका ,हर बेचैनी उसे भी प्रभावित करती है । जब किसान खेत में मेहनत कर रहा होता है तब कम से कम उसका घर – परिवार तो रक्षित रहे ।यह है किसान के दहशत में डूब जाने के मसले ,विचार।समाज को वैचारिक रुप से इतना सशक्त होना चाहिए कि उसके भीतर बसी बस्ती आत्म संयम , मर्यादा ,अनुशासन के बीच सांस ले सकें ।उसका हर घर सुरक्षित और उसमें लहलहाता भविष्य मर्यादा की डोर से बंधा हो ।आज समाज भीड़ से अधिक कुछ नहीं इसलिए उसके पास अनुकरण की भेड़ चाल ही माफिक है ।वह नियंत्रण हीन आत्म वंचना में लिप्त है । ऐसे समाज के बढ़ते असर से हर संवेदनशील व्यक्ति दहशत ही महसूस करेगा ? समाज को मानवीय वैचारिक धरातल पर लौटाना ही इस वक्त की सबसे बड़ी चिन्ता है । 🙏विनीता रघुवंशी

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