तलघर में ******** (१ ) मुझे अक्सर –उसके घर के सामने से ही आना – जाना पड़ता है हर बार वह रोम – रोम से मुस्कुराते हुए — करता दण्डवत …
कविता
असलियत में फर्क नहीं पड़ता ************************ चांद , सूरज ,तारे , जो भी निकलते हैं झील उन्हें अपने भीतर उगा लेती है ये नक्षत्र और ग्रह थरथराती झील में अपने …
चलो अब ******** ( ४ ) क्या कहा — तुम्हें सामान लेकर चलना है ? क्या इस चुटकी भर आग से काम नहीं चलेगा ? इस धूप ,इस नशे इस …
वह *** ( ५ ) इधर अपनी मेहरारु के साथ खेत नींदता वह उधर मेड़ की हरी दूब पर खेल रहे बच्चे तभी एक राकेट निकला धुएं की लकीर खींचता …
आंगन ****** ( १० ) अभी – अभी लीपा संध्या ने आंगन घर भर की नकल करती थिरक रही नन्हीं कृति जिसे देख और -और जीने की ललक ने खटिया …
आंगन ****** ( ७ ) चाहे जिस गांव – कस्बे – शहर देश का हो आंगन : भूगोल नहीं होता जहां कहीं मर रहा होता कोई आंगन धीरे – धीरे …
आंगन ****** ( ९ ) उठा लो बहुमंजिले भवन पर कहां रचोगे घर ? जहां होते सबके एक जैसे मन – आंगन !! ( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता …
आंगन ****** ( ६ ) घर के भाल का पसीना पोंछने आतुर है आंगन हरेक कारज का गमकता उत्सव है आंगन गांव की आह कराह का बंटाईदार है आंगन अब …
