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चलो अब
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( ४ )
क्या कहा —
तुम्हें सामान लेकर चलना है ?
क्या इस चुटकी भर आग से
काम नहीं चलेगा ?
इस धूप ,इस नशे
इस उजाले के अलावा
कुछ और भी चाहिए क्या ?
चलो, अब सब कुछ
रास्ते में ही देखेंगे
अगर ये हवा और आग ही हमारे साथ रहीं
तो बहुत है सीने में धधकती हुई
बाकी सब तो
इसी से सुलगा कर बना लेंगे हम ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत )
प्रेम एक हौंसला है ।यह अगर सीने में धधक रहा है ।चेतना में बस गया है तो फिर दुनिया की सभी सामग्री ,सांसारिक सभी सामान व्यर्थ हैं ।दुनिया को सजाने संवारने के लिए मनुष्य को बहुत सारी भौतिक जगत की जरुरत होती है लेकिन प्रेम ही वह सार्वभौमिक भाव तत्व है जिसे पा लेने के बाद अन्य किसी सामान की जरुरत नहीं रहती ।बस जरुरी तो आदमी का आदमी के साथ खड़ा होना होता है ।यही साथ देने की वृत्ति विस्तार पा कर प्रेम में ढल जाती है । यह प्रिय और प्रिया का साथ हो या आदमी का आदमी की सामाजिकता के रचाव में सहयोग हो ।यही तो संवेदनशील वृत्ति है जिसके बाद भौतिक जगत के उत्पाद बेमानी हो जाते हैं ।यही प्रेम वैचारिक प्रेम है । प्रेम हो जाने के बाद मन में उसकी उष्मा की तरंगों का बहना ही और उसे महसूस करना ही तो आग है हवा की ताजगी है । यही तो प्राणवायु है । यही प्रेम की ऊर्जा का विश्वास है । यह स्पन्दन है प्रेम का जो सीने में आग बनकर धधक रही है । प्रेम की चुटकी भर आग ही पर्याप्त है जीवन व्यतीत करने के लिए ।प्रेम के बिना तो सारा जगत स्मशान के समान है । बिना प्राण के देह है ।कबीर भी कहते हैं —” सांस लेत बिनु प्राण ” प्रेम की सच्ची और गहरी अनुभूति ही प्राण है ।जीवन समान है । कविता में ही से सवाल उभर कर आता है कि — ” इस धूप ,इस नशे ,इस उजाले के अलावा कुछ और भी चाहिए क्या ? प्रेम एक नशा है ,एक उन्माद है ,एक उत्साह है ,एक तरंग है , एक गतिशीलता है , प्रेम रुपी धूप को पा लेने के बाद , उसे महसूस कर लेने के बाद भी , नशे की मदहोशी की तरह डूब जाने के बाद भी , प्रेम जैसे प्रकाश को , उजाले भर रोशनी को पा लेने के बाद भी जीवन कुछ और की जरुरत रहती है ? यह सवाल तो आत्मा के भीतर से उठता है ।यदि जीवन में प्रेम की तृप्ति का अहसास हो जाये तो फिर किसी बाह्य वस्तु की जरुरत ही नहीं होती ।प्रेम के मार्ग पर चलना जरुरी होता है ।शेष तो जीवन पथ में मिल ही जाता है । जगत में जीवन यापन के लिए सामान ,वस्तु ,सामग्री की जरुरत होती है लेकिन जिसे प्रेम जैसी अनमोल पारस मणि मिल गई हो उसके लिए जीवन की तमाम सामग्री और वस्तुएं तुच्छ ही हैं । वह फिर सांसारिक भोग सामग्री को एकत्रित करने में समय जाया क्यों करे ? मन में ,आत्मा में प्रेम की चेतना का जागृत रहना ही साधारण बात नहीं है । यह अगर सीने में धधकती रहेगी तो फिर विश्व चेतना स्वत: आगत भाव में समा जायेगी ।यह प्रेम का कारक भाव है जो नफरत ,परायेपन का शमन करता है ।यही प्रेम की चेतना का ऊर्जा मय वैश्विक सौन्दर्य है ।यही वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा है ।सारा विश्व प्रेम के भाव तत्व में समाया हुआ है ।बस इस प्रेम मार्ग पर चलना भर शेष है ।यही महावीर की अहिंसा है ,यही बुध्दि की करुणा का भाव है ।यही श्रीराम के त्याग का समाहार है , यही श्री कृष्ण की न्याय व्यवस्था का महाभारत है ।यही मुक्ति का मार्ग और चेतना की स्वतंत्रता का संदेश है । इस रास्ते पर निर्बाध चलना ही वैश्विक शान्ति का सफल परिणाम है ।इस रास्ते पर चलने के लिए केवल प्रेम की आग की ही जरुरत है ।उस स्पन्दन के आशय को महसूस करने और उसका अहसास भर पा जाना ही संवेदना , विचार और लोक व्यवहार है ।
विनीता रघुवंशी
