Home आज की कविता

आज की कविता

आज की कविता में आप नित्य रघुवंशीजी के द्वारा लिखी हुई रचनाओं के किसी एक भाग को पढ़ सकतें हैं और उन कविता कि विवेचना का अध्ययन कर सकते हैं .

Dr. Premshankar Raghuvanshi.

नाला —- ११ ************ नाले का जनेऊ पहने पहाड़ अंधेरे में नहाने की अनुभूति का स्फुरण लिए जब माथे पर पगडण्डी की चुटइयां बांधें सुनसान रात में फेंफर तले तांत्रिक …

नाला — ९ ********** अभी अभी नाले में हिरनियां खुरों से आंखें खुजलाती रोयां रोयां चाटती रही देह और भेड़ियों की आहट पाते ही छलांगती हुई समा गई पहाड़ में …

नाला — ८ ********** लोकगीतों की तरह प्रकट होती पगडण्डिया कि जिन्हें रचती हैं अनाम पगथलियां लोक धुनों की तरह अवतरित होते झरने कि जिन्हें रचती हैं घाटियों की उमंगे …

नाला — ७ *********** नाले में जो बह रहा वह पहाड़ ही तो है करुणा से पिघलता कभी का सूख गया होता जीवन का नीर अंगारों की बांहें यदि कदम …

नाला —- ६ ************ सप्तपदी की श्वेत जटाओं से रेशा रेशा धागा लिए चल रहा चट्टानों का हथकरघा और धार – धार तानों बानों- से बुनी जा रही पानी की …

नाला —-५ ********** सुबह – सुबह भाप छोड़ता दोपहर तक माथे पर तटछैंया का फटा गमछा लपेटे किरनों की वंशी में प्रेम चारा लगाये मछलियां पकड़ने का खेल खेलता नाला …

नाला —४ ********* पहाड़ों की कोंख से प्रकट होता उज्जवल कोमल नवजात की तरह किलकारियां भरता लहरों की डोर से — भर भर पैंगे झूल रहा है नाला अकेला मत …

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More