दगरु दा ******** ( ३ ) ( कविता का अन्तिम अंश ) देखने लगे उस राह पर जिससे हर पांच बरस बाद इस गांव में आती रही कारें जाती रही …
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June 2025
दगरु दा ********* ( २ ) ( कविता का दूसरा अंश ) गाने लगते वे भी तरंग में आकर नाचने लगते खुलती चुटइया उनकी तीन – तीन हिस्सों में बल …
मंगल दिवस के प्रति —- मन्ना को **************************** ( २ ) ( पत्र कविता का शेष अंश ) किनारों की संस्कृति नदी का संतुलन बनाती है बड़े सम्मोहन से सभ्यता …
मंगल दिवस के प्रति — मन्ना को *************************** ( १ ) आज रविवार है बलड़ी से नर्मदा के बड़केश्वर घाट पर काफी जल्द आ गया हूं घाटी के ऊंचे टीले …
ठण्डी चट्टान के नीचे ***************** एक घूंट यह एक घूंट पानी मैंने क्यों पिया ? क्यों ? ? सारे दांत ठनक उठे हैं ! गला, जो सदियों से दबोचा जा …
मां से पकौड़िया खाते हुए ********************* मां भजिए बना रही है आज कई दिनों बाद खा रहा हूं देख मां ! यह भजिया कछुए जैसा यह गरुड़ सरीखा यह तो …
यह वही पेड़ है ************* यह वही पेड़ है जिसे तुम पहचानने से इन्कार करते हो ! जब पहली बार —यह पेड़ तुम्हें दिखाया था — इस पर चिड़ियां चहक …
इतनी रात गये कन्देली बह रही है ***************************** ( २ ) चांदनी ,कल्लो,भूरी और गजरी के गमक की जो विश्राम गृहों में साहबों की रात जगमगाती और सुबह — उनके …
