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इतनी रात गये कन्देली बह रही है
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( २ )
चांदनी ,कल्लो,भूरी और गजरी के गमक की
जो विश्राम गृहों में
साहबों की रात जगमगाती
और सुबह —
उनके ही हक में पट्टों को निपटाती
आराम से बिना जोखिम उठाये
कन्देली बह रही है
बेशर्म की झाड़ियां उगायें
सतपुड़ा माथे पर सात – सात
सलवटें लिए
भीतर – भीतर ,दूर – दूर तक उजाड़ नजर आते हैं
खिज्र – खिर्र चल रही है आराम मशीन
वन महोत्सव मनाते हुए
यों फिरनियों ,चीतलों ,सांभरियो ,नीलगायों को
कितनी – कितनी बार
लम्बी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए
अपने अनुभवों से रोमांचित किया बरगद ने
कि कैसे
कब – कब
खट्मिट्ठी करौंदियों ने
बड़े – बड़े पेड़ों की लारेंस टपकाई
मगन मन सुनते हुए ये बातें
अक्स्मात
बीड़ से घास का गट्ठर लादे
भैयाजी की फटकार सुन
गणेश ,सुरेश के साथ लौटते हम
गोधुलि नहाते अपने घर
जहां आते ही वे
हड़क्याये सोन कुत्तों के बारे में बताते हुए
” कल से जंगल में जाने को मना करते “
ओ पिता ! ओ मां !! (सतपुड़ा – कन्देली )
क्या से क्या हो गये हैं ये !—
जिबह किये जाने से पहले
इन्हें , फिर से दे दो इनके आग्नेयास्त्र —
तीर कमान एक बार फिर से !!
इतनी रात गये – – –
सतपुड़ा के गव्हरों से टकराता है
मेरा स्वर – – – और धारदार सवाल लिए
कन्देली बह रही है
नर्मदा की ओर – – – – !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत)
जब हमारा सुराज आया तब भी हमारे ही अधिकारी अंग्रेज अफसरों की नकल करते हुए आदिवासी अंचलों में घुस कर वहां की स्त्रियों के साथ कदाचार करते रहे ।यह शासन – प्रशासन का वह विद्रूप चेहरा था जो कविता में चांदनी ,भूरी ,कल्लो, गजरी की हकीकत बनकर उभरा । यह जितना तल्ख अनुभव है उससे ज्यादा क्या हो सकता है । जमीन के पट्टो को पाने का हक इस तरह भी हो सकता है ।यह शासन- प्रशासन के उस स्वरुप का आचरण है जिसे मौज – मस्ती और कदाचार में दर्ज किया जा सकता है ।हमारे आदिवासी अंचल अपनी अशिक्षा ,अपनी शहरी बोध से अनजान, अपने संवैधानिक अधिकारों से अपरिचित और अनजान होने के कारण इस तरह के शोषण के जाल में हर बार फंसते रहे ।सतपुड़ा अंचल इस तरह अधिकारियों की सैर गाह बन रहे ।समय गुजरता रहा कन्देली बहती रही ।यह नदी अंचल की प्राणधारा थी लेकिन इसने समूचे जंगल को कदाचार – भ्रष्टाचार में लिप्त होते देखा ।आज वर्तमान में जो अधिकारी वर्ग है ,जो शिक्षित प्रशासनिक वर्ग है ,जो जन प्रतिनिधि हैं ,जो कार्यपालिका के हिस्से हैं ,अंग हैं वे सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार में लिप्त हैं । यहां सबसे बड़ा सवाल यही उठ खड़ा होता है कि क्या हमने आजादी इसीलिए पाई कि हम भ्रष्ट और निकम्मी सरकार का चयन कर सकें ।अफसर दलाल बन जायें और नेता चाल बाज बन कर समाज पर अत्याचार ,भ्रष्टाचार ,कदाचार ,मूल्यहीन राजनीति का बोझ डाल दें ।चेतना वान समाज इस तरह की आजादी का मतलब समझेगा । चांदनी का बेघर होना भी एक सामाजिक अवस्था है ।चांदनी का जब जब आशय लिया जाता है तब तब वह कोमलता , भोलेपन, मासूमियत ,रुपवान ,सहृदय , आदि के अर्थ में लिया जाता है ।आजादी के साथ ही हमने विभाजन का सामना किया और साम्प्रदायिक तनाव हमारे दिलों – दिमाग में असर डालने लगा ।आज आजादी पाने के इतने बरसों बाद भी हमारे दिलों – दिमाग से नफ़रत के विचार खतम नहीं हुए ।आज भी हम साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाडने के लिए बहकाये जाते हैं और दंगों ,अशान्ति ,आगजनी,फसाद के मकड़जाल में उलझते जाते हैं ।आज भी हमारी युवा पीढ़ी धर्म के नाम पर बहकाई जाती है ।आदिवासी अंचल आज भी दैहिक शोषण ,आर्थिक शोषण ,और राजनीतिक शोषण, सामाजिक शोषण के जाल में उलझा हुआ है । इसीलिए कविता में यह गुहार और पुकार उठे खड़ी होती है कि आदिवासी अंचल के जन समाज को आत्मरक्षा का अधिकार उन्हें लौटा देना चाहिए जिससे वे अपनी रक्षा खुद कर सके ।उनके आदिम अस्त्र शस्त्र उन्हें फिर मिल जाने चाहिए जिससे वे अपनी अबाल , बुजुर्ग, अबला सब की रक्षा करने में आजाद रहें । यह सवाल हमें हमारी आजादी के बाद स्थापित संस्थाओं की, विभागों की ,संसद की ,विधान सभाओं के,शासन की , अफसरों की ,न्याय व्यवस्था की ,आर्थिक बेहतरी की ,सामाजिक न्याय , राजनीति के औचित्य पर पूछे जाने चाहिए ।ये सब दलाल प्रथा में क्यों बदल गये ।इन सबका रुपान्तरण आज बिचौलियों की भूमिका में हो गया है ।सरकार काम नहीं कर रही लेकिन मनचाहा प्रचार – प्रसार खूब कर रही है। यह राष्ट्र धर्म का और नागरिक चेतना का विरुपण ही है । समग्र देश में अराजकता का वातावरण पसरा हुआ है । कन्देली आज भी पूछ रही है कि आजादी मिले को इतना समय गुजर जाने के बाद भी जन चेतना क्यों नहीं आई ? जनता इतनी परिपक्व क्यों नहीं हुई ? क्यों सत्ता ,सरकार के दबावों के सामने निरस्त्र सी चुप्पी साधे खड़ी रही ।जनता क्यों साहस खो चुकी ? यह सब समय रुपी बहती नदी के भीतर से उठते सवाल हैं जिन्हें पूछा जाना चाहिए था ? बिना पूछे समय रुपी नदी हर हमेशा छटपटायेगी ? नदी की इस बेचैनी का जवाब कहीं समय की धार से ही पैना होकर निकलेगा ? जो समाज, सत्ता ,सरकार,शासन – प्रशासन को एक साथ बेधेगा ? अफसरों से फैलाया जाता भ्रष्टाचार कब वैतरणी में बदल गया यह समय गुजरते जाने के साथ जनता को समझ ही नहीं आया । इस कदाचार – भ्रष्टाचार का स्वरुप धारण किये राज नेताओं के शामिल हो जाने के कारण विकराल हो गया है ।आज वर्तमान हमसे सवाल कर रहा है कि यदि हमारी संवैधानिक ,शासकीय व्यवस्था का यही हश्र होना था तो फिर हमने आजादी का संघर्ष क्यों किया ? हमारा चेतना शून्य रहना और गुलामी में सांस लेना ही वाजिब रहता ? यह कन्देली नहीं भ्रष्टाचार के अन्धकार से भरी नदी है ।जो निरंतर बह रही है । समय बह रहा है । स्वतंत्रता के मायने खो रहे हैं ।आजादी की चेतना जन मन से लुप्त हो रही है ।युवा पीढ़ी भटकाव में है और फुसलाई जा रही है । रात का अंधकार गहरा है ।तंज भी है वन महोत्सव मनाते हुए आरा मशीन चलाई जा रही है पेड़ कट रहें हैं और हरियाली को बचाने का अभिनय हो रहा है ।जंगल काटे जा रहें हैं । ।यह दोहरा पन व्यवस्था के भीतर से रचा जा रहा है ।यही तो दोगला पन है जो ब्रिटिश सत्ता से देशी सत्ता ने सीखा है ।आज तक हम में राष्ट्रीय चरित्र नहीं उभर सका आज तक हम ब्रिटिश सत्ता के ही नागरिक बने हुए हैं ? यह विचारणीय तथ्य है । यह हमारी चेतना पर खड़ा सवाल है ? इसके उत्तर हमें हमारी राष्ट्रीय भावनाओं में ही खोजना होंगे । अफसरों को भारतीय समाज को अपनाना होगा ।सत्ता को वोट की राजनीति से मुक्त होना होगा ।तब सच्चे जन प्रतिनिधि हम चुन सकेंगे? अन्यथा समय तो गुजरता ही जायेगा ।
विनीता रघुवंशी
