चलो अब ******** ( ४ ) क्या कहा — तुम्हें सामान लेकर चलना है ? क्या इस चुटकी भर आग से काम नहीं चलेगा ? इस धूप ,इस नशे इस …
तुम पूरी पृथ्वी हो कविता
वह *** ( ५ ) इधर अपनी मेहरारु के साथ खेत नींदता वह उधर मेड़ की हरी दूब पर खेल रहे बच्चे तभी एक राकेट निकला धुएं की लकीर खींचता …
आंगन ****** ( १० ) अभी – अभी लीपा संध्या ने आंगन घर भर की नकल करती थिरक रही नन्हीं कृति जिसे देख और -और जीने की ललक ने खटिया …
आंगन ****** ( ७ ) चाहे जिस गांव – कस्बे – शहर देश का हो आंगन : भूगोल नहीं होता जहां कहीं मर रहा होता कोई आंगन धीरे – धीरे …
आंगन ****** ( ९ ) उठा लो बहुमंजिले भवन पर कहां रचोगे घर ? जहां होते सबके एक जैसे मन – आंगन !! ( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता …
आंगन ****** ( ६ ) घर के भाल का पसीना पोंछने आतुर है आंगन हरेक कारज का गमकता उत्सव है आंगन गांव की आह कराह का बंटाईदार है आंगन अब …
आंगन ****** ( ७ ) चाहे जिस गांव – कस्बे – शहर देश का हो आंगन : भूगोल नहीं होता जहां कहीं मर रहा होता कोई आंगन धीरे – धीरे …
आंगन ****** ( ६ ) घर के भाल का पसीना पोंछने आतुर है आंगन हरेक कारें का गमकता उत्सव है आंगन गांव की आह कराह का बंटाईदार है आंगन अब …
