Home आज की कविताआंगन – तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

आंगन – तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by admin
आंगन
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( १० )
अभी – अभी लीपा
संध्या ने आंगन
घर भर की नकल करती
थिरक रही नन्हीं कृति
जिसे देख
और -और जीने की ललक ने
खटिया से उतार कर
आंगन – आंगन कर दिया बाबा को !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
” आंगन ” वृत्त में घूमती कविता की अन्तिम कड़ी की कविता इस कविता के साथ ही कविता संग्रह —- “तुम पूरी पृथ्वी हो कविता” की सभी रचनाएं भी सममाप्त हो गई लिखने और विचार के लिए । अब कल से प्रथम कविता संग्रह —” आकार लेती यात्राएं ” कविता संग्रह की कविताएं ।
आंगन एक समय में कच्चे रखें जाते थे ।आंगन का अर्थ ही था कच्चा हिस्सा जिसे गोबर से लीपा जाता था ढिंग दी जाती थी और साफ – सुथरा रखा जाने वाला घर का खुला हिस्सा जिसमें खड़ी और गेरुआ से मांडणे,अल्पना ,रांगोली रची जाती थी ।अतिथि देवों भव की अगवाई में पगले रखें जाते थे पगले रखने से यह माना जाता था कि इस आंगन में जिन – जिन ने अपने चरण धरे उन सबके निशान – चिन्ह ही वे प्रतीक हैं जो वहां आंगन में उकेरे गये । चरण के निशान या आकृति रच कर उनको सौभाग्य से जोड़ कर देखा जाता था यह हमारी संस्कृति की परम्परा और रीति रिवाज रही ।यह उस घनघोर आत्मीयता का , ममत्व का भी उपकृत्य भाव है जिसके कारण घर – परिवार की समृध्दि भी देखी- समझी जाती है ।घर मकान नहीं होते थे उनमें रिक्तता का वास नहीं वरन जीजीविषा की चेतना तरंग बनकर बहा करती है । नन्हीं पीढ़ी यहीं से अपने जीवन का रस सींचती और पीती बड़ी हो जाती है ।लगाव और नेहा की नकल उतारते उतारते वे खुद कब उस स्नेह ,प्यार को महसूस करना सीख गई यह उन्हें भान – ध्यान नहीं रहता ।वे खुद लगाव का मतलब समझ गई उनके जीवन में लगाव ,प्यार ,प्रेम कब जीवन के रस से भर गया इसका उन्हें कोई अहसास नहीं रहा ।बूढ़े बाबा मरणासन्न अवस्था को भूल कर खुद खाट से उतरा नन्ही बालिका के खेल में शामिल हो गये यह सब उनके अन्दर जीने की इच्छा पैदा हो जाना भी तो आंगन का चमत्कार ही तो है । वर्तमान में बाबा – दादी सब नन्ही पीढ़ी के मन में बोझ की तरह समा दिये गये हैं । नन्हीं पीढ़ी केवल शिक्षित होने का बोझ उठा रही है उनके जीवन से पीढ़ियों के बीच के अन्तर सूत्र सुखा दिये गये हैं ।वे बुजुर्ग पीढ़ी से दूर और पराई हो चुकी है ।परिवार का माहौल भी आज के समय में तनाव और परस्पर दूरियों वाला हो गया जो आदमी में जीने की इच्छा नहीं बल्कि मौत की प्रतीक्षा के मनोभाव ज्यादा उत्पन्न करती है । वर्तमान की आधुनिकता से उपजता यह मनोभाव आदमी को उदास ,मायूस और निराशा से भरता है ।यदि समाज में तनाव की ग्रन्थियां न पनपे तो प्रौढ़ पीढ़ी, बुजुर्ग पीढ़ी ,युवा पीढ़ी , नन्हीं पीढ़ी आपस में अपने आत्मीय रिश्तों के साथ सूत्र- दर -सूत्र अनुभव , अनुभूति की साझा डोर के दृढ़ बंधन समाज में व्याप्त कटुता को प्यार में बदल सकते हैं । परिवार ही वह धुरी है जहां से मनुष्य प्रेम को जीना सीखाता है । जहां से जीने की ललक बढ़ती है ।यदि परिवार में ही प्रेम ,प्यार के स्रोत सूखे हैं तो फिर प्रेम ,लगाव,आत्मीयता ,प्यार के बहते झरने भी संस्कार में नहीं समा पायेंगे ।परिवार में केवल खुदगर्जी ,स्वार्थ ,अपना – पराया के तनाव भरे ,नफरत घृणा ,दुराव – छुपाव के कपट पूर्ण व्यवहार ही रचे रहेंगे । नन्हीं कृति प्रतीक है चंचलता और नवजात पीढ़ी की सहजता का । बूढ़े बाबा प्रतीक हैं बुजुर्ग पीढ़ी के जहां मृत्यु की शिथिलता भी छूट जाती है और जीने की ललक पैदा हो जाती है यह पीढ़ियों का सामंजस्य का ही परिणाम है । नव पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से सीखती है समझती है अनुभव साझा करती है ।ये पीढ़ियों की आपसी लेन दारी और देन दारी होती है ।यही सामंजस्य ही तो जीजीविषा उपजाता है ।यही चेतन अवस्था जीने का हौंसला बनाती हैं ।जीवन कुछ नहीं यदि उसमें लगाव की सम्पन्नता नहीं,प्रेम की प्रगाढ़ता नहीं ,प्यार भरा दुलार नहीं ,धन- वैभव तो बाहरी शान है अन्दर की सम्पदा मन की दौलत तो लगाव और आत्मा के डूब जाने का अहसास है । आंगन सी जगह हर घर में हो यही इच्छा समाज इच्छा बन जाये ।
🙏 विनीता रघुवंशी

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