आदमी होते ही ************ हमसे ज्यादा कल्याण कारी हैं टेबल कार्बन का गरलपान करते और बदले में लुटाते आकसीजन का अमृत हमसे ज्यादा ततववती है लताए़ जो फलती फूलती समर्पित …
नहीं रहने के बाद भी
नामुमकिन ********* नहीं पढ़ी होती हयग्रीव की कथा तो मैं भी तुम्हारे द्वारा लगातार परोसी गालियां खाते हुए लगातार मुस्कुराता नहीं वत्स ! वेदों को चुराने तक तो क्षम्य था …
खिलखिलाती नदी **************** चिन्ता में डूबी नदी सूखकर काँटा होती चिढ़चिढी़ होते ही रुक जाती धार और क्रोध से बन जाती रेत ओ ! मेरे गाँव की नदी हँसती रह …
निठल्ली नहीं बैठती तुम्हारी दिल्ली *********** सुना है रस्म अदायगी में माहिर है तुम्हारी दिल्ली वह जितनी तन्मयता से राजघाट पर श्रध्दार्पण करने वालों के साथ ईश्वर अल्ला तेरे नाम …
नामुमकिन ********* नहीं पढी़ होती हयग्रीव की कथा तो मैं भी तुम्हारे द्वारा लगातार परोसी गालियाँ खाते हुए लगातार मुस्कुराता नहीं वत्स ! वेदों को चुराने तक तो क्षम्य था …
कहाँ तक बहेगी नदी ***************** नदी किनारे — रेत पर घरघूले बनाते बच्चे नन्हीं इच्छाएँ लिए गृह निर्माण की कलाएँ सीख लेते सीख लेते किलों की रचना और यह भी …
आदमी होते ही ************* हमसे ज्यादा कल्याणकारी है पेड़ कार्बन का गरल पान करते और बदले में लुटाते आक्सीजन का अमृत हमसे ज्यादा तत्ववती हैं लताएँ जो फूलती -फलती समर्पित …
