रुँ -रुँ बाजा रुँगताडा ***************** लगे लबारी ढोल पीटने नाच रहे गलियों में नंगे भिन्न -भिन्न फिरकों में बँट कर भड़काते रहते दंगे ऐसे ऐसे काम करे ये ज्यों यमराजों …
मुक्ति के शंख
रुँ-रुँ बाजा रुँगताडा़ ***************** (21/5/21 के अंश से आगे ) ये सारी सुविधाएँ ओढे़ हमको नहीं नसीब रोटियाँ उन पर ऋतुएँ मेहरबान हैं हमें मिली केवल लँगोटियाँ तिसपर भी वे …
रुँ -रुँ बाजा रुँगताडा़ ****************** रूँ -रुँ बाजा रुँगताडा़ रुँगताडा़ भई रुँगताडा़ टी .व्ही .पर ऐलान हुआ वन में गूँजी हुआ- हुआ चोर उच्चके पायेंगे बिन मेहनत मालपुआ अगली सदी …
विजय ****** पाँव मेरे बहुत जिद्दी हो गये हैं इन्हें चलने के अलावा सूझता कुछ भी नहीं और तेरा शुक्रिया कर लूँ कि तूने व्यथाएँ इतनी बिछा दी राह पर …
जीवन ****** तमाम पंखुरियाँ झर जाने के बाद सुगंध का अहसास फिर भी रहेगा घर-घर , वन -वन झर रहा गुलाब -सा जीवन ।। (श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के गीत …
मत करो ******** मोड़ चाहे सफर के हों या सड़क के -भले लगते हैं गुजर करके सुरंगों से आ रहे वे लोग हो चुका जिनके जेहन में आत्मघाती रोग जहाँ …
गीतों के ******** गीतों के हरे भरे नंदन में जाने ये क्या हुआ ? कोसों तक उठती थी टेसू की सुर्ख हँसी कोसों तक महुए की मनुहारें सुनते थे कोसों …
