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May 2025

ऐसे में ****** जब भी लिखना चाहता कविता मुझे अपने जूते की कील आंंसने लगती जिसने तलुए को छलनी छलनी कर दिया है मेरे पीछे। बढ़े आ रहे सिपाही फुर्ती …

चलो अब ******** तुम्हारी गोदी में सिर धरे सोता हूं उस वक्त मैं एक नन्हा मेमना होता हूं उस वक्त— मेरा यह ‌‌अपनापन और उसके आसपास का सब कुछ खो …

आदेश सो रहे हैं ************** शोर मत करो —यहां आदेश सो रहे हैं जाग गये तो गज़ब ढा देंगे गर्दनें झुकायें चलो ताकि सड़क को भी लगे कि उस पर …

सतपुड़ा की शाम ************** बड़ी – बड़ी घाटियों पर अचार चुनती हुई बुढ़िया – सी किरन ओझल हो गई और अब रह गया महुओं सा भरा आकाश बीच – बीच …

बच्चे ***** बच्चे पेड़ नहीं काटते पत्तियों से निकाल कर रस बनाते हैं दीवारों पर कल के नक्शे बच्चे चिड़िया नहीं मारते उनके पंखों को बीन बीनकर सजाते हैं मेज …

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