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ऐसे में
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जब भी लिखना चाहता कविता
मुझे अपने जूते की कील आंंसने लगती
जिसने तलुए को
छलनी छलनी कर दिया है
मेरे पीछे। बढ़े आ रहे सिपाही
फुर्ती से चल रहे हैं
ऐसे में झुक कर
कैसे निकालूं जूते की कील ??
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” आकार लेती यात्राएं ” से उद्धृत)
जब भी लिखना चाहता कविता मुझे अपने जूते की कील आंंसने लगती यह अनुभव बहुत ही अनूठा है ।कविता लिखना अलग कर्म है और उस समय जूते की कील का आंसना ,चुभन की स्मृति उभरना यह एक अनुशासन है ।यह उभरना एक टीस है ,एक अहसास है असमर्थता का ,अभाव का ,जहां अनुशासन की कवायद में बंधे सिपाही के अनुकरण और अनुशासन बध्द होने की स्थिति है ।यदि आगे का सिपाही झुकता है तो अनुशासन बध्द पूरे सिपाही भी झुक जायेंगे ।यह सिपाहियों का आत्म समर्पण समझा जायेगा ।इस दशा में सिपाही खुद – ब- खुद हार की अवस्था में होंगे । इसलिए जूते की कील को और छलनी छलनी हुए तलुओं को भी सहना होगा । जहां पूरे समाज की अगुवाई की जिम्मेदारी नेतृत्व पर हो वहां झुकना जोखिम भरा होता है ।झुकना हार भी है ,पराजय भी है ,समर्पण भी है । इसलिए पगथली को तो कील की चुभन से होने वाले दर्द को सहना ही होगा ।यह परिवार में मुखिया की जिम्मेदारी होती है , वहीं समाज में सुधारक का दायित्व होता है और राष्ट्र में नायक का दायित्व होता है ।नायक को हर समय जोखिम लेते समय विचार करना होता है ।वह जानता है कि नायक के झुकने से सभी अनुकरण करते अनुशासन में बंधे हुओं की मौत तक निश्चित है । इसलिए कविता लिखने जैसा संवेदनशील कर्म हो या नायक बन कर आगे चलने की जिम्मेदारी हो ।दोनों में ही खतरे हैं ,जोखिम है , रिस्क है । इसलिए झुकना इतना आसान या सरल नहीं है ।पगथली में चुभती टील का दर्द तो सहना ही होगा ।यह दर्द भी एक अहसास है बदलाव का जिसमें आदमी अपने जूते में गड़ती कील तक़ को निकाल नहीं सकता ।यह कील क्या है ? यह कील है अव्यवस्था की , यह कील है अभावों की ,यह कील है अनियमितता की , यह है कमजोरी की ,यह कील है अन्याय की , यह कील है असमानता की ,यह कील है नफरत की ,यह कील है दंगा -फसाद ,आगजनी ,अशान्ति , और व्यवस्था जन्य पीड़ा ,यातना की ,संघर्ष की , बेरोज़गारी और बे-इंतजाम की जब भी संवेदना के क्षण जीवन के नजदीक आयेंगे तब तब यह कील दर्द देगी ।जब भी सुधार के लिए कदम बढ़ायें जायेंगे तब तब जोखिम भी रहेगी ही ऐसे में सख्त निर्णय लेना बहुत ही जोखिम भरा है ।ऐसी स्थिति में झुकना और अपने अकेले के दर्द को महसूस करना और भी ज्यादा जोखिम भरा है । जहां अगुवाई महत्वपूर्ण है और कठिनाई की कोई प्राथमिकता नहीं है ।समाज के बदलाव का दर्द ज्यादा महत्वपूर्ण है व्यक्तिगत दुख दर्द सुख की महत्ता गौण हो जाती है ।ऐसे समय में समाज के भीतर से आता दबाव भले कितना भी सख्त क्यों न हो लेकिन अगुवाई करते व्यक्ति को उसके सामने कभी झुकना नहीं है ।जरा सा झुकने पर पूरा समाज कमजोर हो जायेगा, समाज की व्यवस्था और नियम बध्दता कमजोर हो जायेगी । इसलिए बदलाव के हर निर्णय के लिए दर्द को कठोरता से सहना ही होगा ।यह लोक कल्याण के लिए उठाया गया दर्द है जो जोखिम भरा भी है ।सख्त निर्णयों से , पाबन्दियों से ही बदलाव संभव है ।यदि आन्तरिक कमजोरियां निर्णयों पर हावी हो जाती है तो फिर बदलाव की गति भी शिथिल हो जाती है । इसलिए सख्ती से दर्द को बर्दाश्त करना ही सही कर्मशीलता है । जिस तरह सिपाही और फौज अनुशासन बध्द रहती है वैसे ही समाज को भी मर्यादाओं के भीतर ही अपनी समस्त गतिविधियों को बढ़ावा देना चाहिए ।तलुआ याने पगथली का छलनी छलनी होना अर्थात समाज के लोक आचरण अमानवीय हो जाना । जब भी समाज की मानवीय मर्यादाओं की चर्चा होगी ,विमर्श होगा , विचार किया जायेगा तब तब उनके टूटने की चुभन तो आंसेंगी ही ,एक कसक मन में दर्द का अहसास करायेगी ।इस तरह टूटती मर्यादा के साथ संवेदन शील कविता का रचना असंभव हो जाता है । संवेदना से रची कविता के लिए समाज का संवेदना शील होना भी बहुत जरुरी है ।
विनीता रघुवंशी
