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नाला —- ११ ************ नाले का जनेऊ पहने पहाड़ अंधेरे में नहाने की अनुभूति का स्फुरण लिए जब माथे पर पगडण्डी की चुटइयां बांधें सुनसान रात में फेंफर तले तांत्रिक …

नाला — ९ ********** अभी अभी नाले में हिरनियां खुरों से आंखें खुजलाती रोयां रोयां चाटती रही देह और भेड़ियों की आहट पाते ही छलांगती हुई समा गई पहाड़ में …

नाला — ८ ********** लोकगीतों की तरह प्रकट होती पगडण्डिया कि जिन्हें रचती हैं अनाम पगथलियां लोक धुनों की तरह अवतरित होते झरने कि जिन्हें रचती हैं घाटियों की उमंगे …

नाला — ७ *********** नाले में जो बह रहा वह पहाड़ ही तो है करुणा से पिघलता कभी का सूख गया होता जीवन का नीर अंगारों की बांहें यदि कदम …

नाला —- ६ ************ सप्तपदी की श्वेत जटाओं से रेशा रेशा धागा लिए चल रहा चट्टानों का हथकरघा और धार – धार तानों बानों- से बुनी जा रही पानी की …

नाला —-५ ********** सुबह – सुबह भाप छोड़ता दोपहर तक माथे पर तटछैंया का फटा गमछा लपेटे किरनों की वंशी में प्रेम चारा लगाये मछलियां पकड़ने का खेल खेलता नाला …

नाला —४ ********* पहाड़ों की कोंख से प्रकट होता उज्जवल कोमल नवजात की तरह किलकारियां भरता लहरों की डोर से — भर भर पैंगे झूल रहा है नाला अकेला मत …

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