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लोकगीतों की तरह-पकी फसल के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
नाला — ८
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लोकगीतों की तरह
प्रकट होती पगडण्डिया
कि जिन्हें रचती हैं
अनाम पगथलियां
लोक धुनों की तरह
अवतरित होते झरने
कि जिन्हें रचती हैं
घाटियों की उमंगे
लोक वाद्यों की तरह
झंकृत होते नाले
कि जिन्हें
अरण्य ध्वनियां रचती हैं
लोक कथाओं की तरह
संगत देने फूट पड़ती नदियां
कि जिन्हें
घाट घाट संस्कृतियां रचती हैं
छलक उठती लोक रंगों की तरह झीलें
कि जिनके दरपन में
जगमगाता रहता वन
अपनी आदिम श्रुतितो के साथ ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” पकी फसल के बीच “” की पांडुलिपि से उद्धृत )
नाला प्रवाह का प्रतीक है ।जब जब नाले के समीप रचनाकार का आत्मिक चेतना पहुंचती है तब तब नाला अपने स्वरुप का परिचय विविध छवियों में प्रस्तुत करता है ।यही छवियों की विविधता ही एक वजह है कि नाले को लेकर असंख्य रुप – छवियां कवि के मन में उत्प्रेक्षा बनकर ,कल्पना बनकर , उभरी और नाला शीर्षक से इतने गहरे प्रभाव के साथ नाला अपने अस्तित्व के साथ हम सबके भीतर अवतरित और जीवन्त हो गया ।अब हर नाला धनपाड़ा का नाला हो गया ।जिस तरह लोक गीत अरचित होते हैं । नाले से प्यास बुझाता जन समुदाय नाले के आसपास से गुजरता है और अपने भार को न महसूस करने के लिए ,सूनेपन को ध्वनियों में भरता है ।वहीं स्वर तो लोक गीतों को रचती पगडण्डिया बन जाती है ।रोज ब रोज नई नई पगडण्डिया बनती हैं ।नये नये लोकगीत रचे जाते हैं ।नाला अंचल की प्राणधारा ही नहीं वरन लोक जीवन के रचाव का आधार भी है । बहुत सारी अनाम पगथलियां रोज नाले के आसपास से गुजर कर अपनी प्यास ,अपनी तीस को तृप्ति में बदलती है ।नाला जलधारा ही नहीं वरन लोक जीवन धारा भी है ।नाले के वजूद को बनाये रखने के लिए सतपुड़ा के पहाड़ से फूटते हैं अनगिनत झरनें जो लोक धुनों के उभरते संगीत का सुमधुर स्वर है ।यह मधुर स्वर घाटियों से निसृत संगीत है जिनमें पंछियों की चहचहाट है , पशुओं की तीखी हुंकार है । कल-कल बहती झरनों की धार है ,वनबालाओ के नूपुर की झंकार है तो है चूड़ियों की खनक सब कुछ मिला-जुला प्रकृति के रंग में रचा बसा ।अरण्य ध्वनियों से झंकृत नाला का रुप मनोहारी है ।नाला भी जल स्रोत है नदियों की तरह , तालाबों की तरह , झरनों -झीलो की तरह ,कुओं और बावड़ियों की तरह , सरोवरों और सागर की तरह ,ताल – तलैया की तरह । जहां जहां भी जल स्रोत होंगे वहां वहां लोक कथाएं होंगी , लोक संस्कृतियों का जन्म होगा ।झीलों के दरपन में लोकोक्तिया और जन श्रुतिया रची जाती रहेगी । जन कथाएं भी जल स्रोतों के परिभ्रमण में ही रची जाती है । जिस अंचल में जितने जल स्रोत और जल धाराएं होंगी वहां वहां लोक संस्कृति का स्वत: रचाव होता जायेगा ।जल प्राणियों के जीवन संरक्षण का सबसे बड़ा कारण है ।लोक संस्कृति और जन धाराएं सब जल की चेतना पर अवलंबित है ।बिना जल स्रोत के संस्कृतियां नष्ट हो जाती है ।प्यास की तृप्ति ही प्राणियों के जीवन सुरक्षा का आधार है । जल की ,पानी की महत्ता को समझना ही जीवन – बोध है ।
🙏 विनीता रघुवंशी

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