Home आज की कवितापहाड़ों की कोंख से प्रकट होता-पकी फसल के बीच

पहाड़ों की कोंख से प्रकट होता-पकी फसल के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
नाला —४
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पहाड़ों की कोंख से प्रकट होता
उज्जवल कोमल नवजात की तरह
किलकारियां भरता
लहरों की डोर से —
भर भर पैंगे झूल रहा है नाला
अकेला मत छोड़ो
इसलिए कि किनारे किनारे बना लिए इसके
सांप, बिच्छू , अजगर ,गोत्रों ने बिल
बर्रों ने छत्ते
वन भक्षियों ने मचानें
अकेला मत छोड़ों मोहन को
इसलिए कि —
इसके मधुवन में कभी दावानल
तो कभी पूतना -सी
बहक उठती हैं हवाएं
मत छोड़ों अकेला
इस नाले को
सतपुड़ा के नाले को ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- “ पकी फसल के बीच ” की पांडुलिपि से उद्धृत )
नाले में नवजात के जन्म की कल्पना में बहुत से खतरों की आशंका जताई गयी है ।यह नाला नहीं वरन एक नन्हा कृष्ण है ।जिस तरह बाल कृष्ण की बाल्य अवस्था में श्री कृष्ण को अकेला पाकर तरह के जो राक्षस – राक्षस नियो की पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं ।उसी तरह धनपाड़े के इस नाले को भी अकेला छोड़ देने पर याने निर्जन दशा में यहां भी बहुत तरह के कब्जे और कृत्य ,आपराधिक गतिविधियां पनपने लगेंगी। इसलिए यह भी पूरे अंचल के लिए नवजात शिशु की ही तरह है जो अपनी रक्षा करने में असमर्थ हैं । इसलिए इस नन्हें नवजात की देखभाल और रक्षण तो अंचल की आबादी को ही करना है । यदि बस्तियों के जन समूह इस नाले के आसपास आते – जाते रहेंगे तो यहां वन की सम्पदा पर आपराधिक समूह ,माफिया ललचायेगा नहीं ।उनका भय व्याप्त नहीं होगा ।जब तक जंगल , पहाड़, पर्वतों, नदियों और सागर पर जन समूहों की आवाजाही बनी रही तो वे सुरक्षित रहे ।जैसे ही जनता ने इन्हें अकेला छोड़ा मतलब ये इलाके निर्जन हुए वैसे ही इन को उजाड़ने की गतियां तेज हो गई । पहले वनों में वन – भोज का आयोजन होता था , पूजा और कुल देवता की मनौतियों को पूरा करने के लिए कुल – खानदान ,तुलादान -मान, मुण्डन के लिए भी वनों में देव स्थान सृजित करते रहते थे और इस तरह जंगल के वृक्ष, पेड़ – पौधे ,अन्य सम्पदा समाज के हाथों और निगाह बानी से रक्षित होती रहती थी । आज वर्तमान में जन चेतना के अभाव और आस्था में आई गिरावट के चलते वन ,वृक्ष, नदियां और नाले,झरने,प्रपात उपेक्षित हो गये । इसलिए इन पर सांप ,बिच्छू,अजगर जैसे विषैले जीव रुपी माफिया की सरपरस्ती पनप गई । इसलिए ये मोहन है याने मन को मोहने वाला है ।अभी अभी पहाड़ की कोंख से जनमा है । कोमल है और किलकारियां भर रहा है ।सतपुड़ा का यह वारिस नाला का पालन – पोषण अभी जन समुदाय के द्वारा की जाना चाहिए ।यह चेतना भी बहुत ही माकूल है ।नाला देश का प्रतीक भी हो गया है ।यह अवतार भी है और देश भी है ।इसमें दोनों रुपक समाए हुए हैं ।देश को भी नागरिक चेतना से रिक्त नहीं छोड़ना चाहिए अन्यथा आपराधिक सत्ता समूह सक्रिय होकर देश की आजादी को ,स्वतंत्रता को नुक्सान पहुंचा सकते हैं । नाला नवजात है मोहन के प्रतीक में यह प्रतीक के मायने हैं श्रीकृष्ण का बाल रुप ।जिस तरह कंस के द्वारा भेजे गये पूतना , कालिया दह आदि राक्षस बाल कृष्ण को मारने के लिए आये उसी तरह नाला भी नन्हा – सा है और मारा जा सकता है ।ऐसी हवाएं हैं जो पूतना – सी हैं ऐसी आग की तबाही है कि दावानल रच सकती है । नाला पर्यावरण की चेतना का भी पर्याय है । नाला है तो जंगल है ,ताजी हवाएं हैं ,पेड़ – पौधे हैं ,जड़ी – बूटियां हैं ,पशु – पक्षी हैं ,कंद – मूल ,फल – फूल हैं ।स्वायत्तता है , स्वतंत्रता है । वन है तो संवेदना है ,वन है तो जीवन है , वन है तो नदियां हैं , सागर है ।सबका जीवन आधार है वन और वन में बहते नाले ।नाला है तो वन मधुवन है । इसलिए नाले को अकेला मत छोड़ो यह एक चेतावनी है मानव जीवन को बचाने के लिए । नाला प्रवाह है । जीवन धारा है इसलिए इसे अकेला नहीं छोड़ा जाना चाहिए यह सचेत और सावधान करने का संदेश है ।
🙏 विनीता रघुवंशी

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