Home कविता सतपुड़ा के शिखरों से

सतपुड़ा के शिखरों से

कुछ वैसा ही *********** लिख लिखकर मैं होता प्रसन्न पढ़कर बतलाता बार बार ! ! सूरज लिखता ज्यों ज्योतिपत्र लिखता चंदा ज्यों धवल प्यार तारे लिखते ज्यों नभ गंगा बादल …

लौट रहे हैं गाँव में **************** बहुत दूर से खलिहानों तक हल्की हल्की लाल लाल सी धूल उड़ रही निश्चय ही चेतुए खेत से संझ्झा के संग लौट रहें हैं …

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