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October 2024

आइन्दा ****** उसकी जिंदगी में काम आने के लिए उसे अपना लहू दिया और वह जल्दी – जल्दी उसे साबुन से धोने लगा मैंने उसे टोंका —– यह क्या कर …

अणुबम के बादल ************** घृणा के घेरों में बंद वे लोग बढ़ा रहे बागुड़ें उठा रहे अणुबम के बादल पहाड़ इस संकट में बूढ़े संस्कारों के बर्फ का कफन ओढ़े …

प्रेम **** ( ९ ) यदि तुम अपनी गंध , दमक ,सिहरन ,स्वर और उष्मा नहीं बोती तो ये जमीन कहीं की भी नहीं होती । ( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी …

प्रेम **** ( ८ ) कितना घुला – घुला है पठार हाथ हिला -हिला कर टेर रहा लगातार सुनो और देखो उधर ! ( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता …

प्रेम **** ( ६ ) ओह! कितना कीचड़ यहां अब हम अपने खून पसीने से उगायें कमल । ( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–” तुम पूरी पृथ्वी …

प्रेम ***** ( ४ ) जब नहीं होती पास तो होती एक कविता ठीक तुम्हारी तरह होने पर होती तुम एक कविता कविता की तरह । ( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी …

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