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अणुबम के बादल
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घृणा के घेरों में बंद वे लोग
बढ़ा रहे बागुड़ें
उठा रहे अणुबम के बादल
पहाड़ इस संकट में
बूढ़े संस्कारों के बर्फ का कफन ओढ़े
शोक मना रहे
हिस्टीरिया से पीड़ित हैं मैदान
घाटियों के जोड़ – जोड़
दर्द से टीस रहे
नींव के पत्थरों की कानाफूसी में
दीवारें सिसक उठीं हैं
कि वे चाहते हैं पुजना —
सृजन के देवता की तरह
दरख्तों को डालियों पर भरोसा नहीं
डालियों को फूलों पर
फूलों को अपनी ही गंध पर
जो पांखी अपनी ही ताकत से
ऊपर उड़ता
संयम के नाम पर दास्तां देते हुए
काट देते उसके पंख
पगडंडियों की रौनक
राजपथों ने छीन ली
उंघते गलियारे अंधेरों में
चुराई रोशनी से जगह – मगर शहर
सारा परिवेश —
पतझर की खुशामद में है
या फांक रहा धूल
दूर – दूर तक अंधेरे हो गये आईने
शक्लें परेशान हैं
मित्रता की खोज में
कैसा अजनबी है ये मौसम
कैसा – – – – ??
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में युध्द से उत्पन्न संहार की चिन्ता और मनुष्य पर घुमड़ते संकट पर विचार किया गया है ।द्वितीय विश्व युद्ध का अन्त जापान के दो शहरों पर अमेरिका द्वारा बरसाये गये अणुबम “नागासाकी” और “हिरोशिमा ” की तबाही को अभी भूलाया नहीं जा सका है ।इस हमले की पीड़ा आज भी जापान की पीढ़ियां सहन कर रही है और आज विश्व तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर आ खड़ा हुआ है ।सब तरफ शोर है युध्द युध्द की हाहाकार मची हुई है । मनुष्य दर – बदर सा शरण लेने को भटक रहा है । घर नष्ट हो चुके हैं । राष्ट्राध्यक्ष अपने अहंकार के पागलपन में युध्दोन्मत्त है ।द्वितीय विश्व युध्द के समय अमेरिका ही ऐसा राष्ट्र था जिसके पास परमाणु शक्ति थी लेकिन आज स्थितियां बदली हुई है ।विश्व के बहुत से देशों ने परमाण्विक हथियार और बम निर्मित कर लिए हैं। या तकनीक विकसित कर ली है ।आज परमाणु बम के खतरे बढ़ गये हैं ।यह विचारणीय तथ्य है कि यदि दुनिया में कोई भी राष्ट्राध्यक्ष अपने अहंकार पर संयम खो देता है तो दुनिया एक बहुत बड़ा मलवे , खण्डहरों ,टूटी – फूटी इमारतों , उजड़ी बस्तियों की केवल तस्वीर बन कर रह जायेगा ।आज विश्व के बहुत से देश मानवता की रक्षा करने के लिए एक – दूसरे को मिटाने के लिए आतुर है ।सवाल यहीं से उठ खड़ा होता है कि एक के पक्ष में की गई हिंसा रक्षक कैसे हो जायेगी ? हिंसा से तो हिंसा ही बढ़ेगी ? इससे मानव कल्याण और हित कैसे संभव है यह चिन्तन का विषय है ।नफरत किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकती ? जब दुनिया की सत्ताओं पर आसीन नेतृत्व ही नफरत ,घृणा की सीमाओं में बंद रहकर दुनिया को युध्द की आग में झौंकने को उतावले होंगे तब हर राष्ट्र की जनता किस तरह सुखी ,सुकून और शान्ति महसूस करेगी ? शान्ति के लिए युध्द या हथियारों की स्पर्धा के लिए मानव अस्तित्व का सर्वनाश ? हथियारों से प्राप्त ताकत और शक्ति तो केवल आतंक ,मौत का पर्याय ही है । मनुष्य होने के जो संस्कार हैं वह आज बूढ़े हो चुके हैं वे केवल शोक में डूबे हैं उनकी गरिमा उन्माद ने खत्म कर दी है ।आज विश्व सत्ता केवल नाश का ,हिंसा का ,खेल खेल रही है मनुष्य जो अपनी उड़ान में स्वतंत्र है उसे विश्व व्यवस्था ने अपना दास बना रखा है ।आज समाज की जो बुनियाद है ,जो घर – परिवार हैं वे कानाफूसी कर रहे हैं हालात पर विचार – विमर्श कर रहे हैं लेकिन डरे हुए हैं ,भयभीत हैं ।क्या समाज की यह स्थिति विचारणीय नहीं ।आज हर राष्ट्र का नेतृत्व केवल नफरत और घृणा को बढ़ावा दे रहा है ।उसे इंसानियत से कोई मतलब नहीं ।क्या मनुष्य का अस्तित्व ,उसकी गरिमा ,उसकी अस्मिता इतनी मामूली और निर्मूल्य हो गयी कि आज विश्व सत्ताधीशों के अहंकार और बैर – विरोध के लिए उनके जीवन का उपयोग हो रहा है ।दुनिया के सभी लोग अब शंकाओं से घिर चुके हैं ।आपसी विश्वास और भरोसा अपनी चेतना की धुरी छोड़ चुका है । मनुष्य का मनुष्य पर से विश्वास उठ गया और वह यंत्र पर आ टिका है ।शहर की चकाचौंध गांव की गलियों से चुराई गई है याने शहर के पास अपनी कोई क्षमता नहीं है वह तो गांव से आए श्रमिकों ,मजदूरों ,मेहनत कशों पर निर्भर है ।शहर तो अपने लिए कोई उत्पादन भी नहीं करता वह तो गांव की फसलों से ही अपने उदर पोषण के साधनों पर निर्भर है । वर्तमान में पूरे। विश्व पर परमाण्विक युध्द के बादल मंडरा रहे हैं ।इससे आज के समाज को चिन्तित तो होना ही चाहिए ।विश्व की और देशों की तरक्की और उन्नति का अन्तिम सत्य यदि विनाश और विकलांग पीढ़ियों के जनम पर ही जा टिका है तो फिर आदमी को अपनी सृजन शीलता पर पुनर्विचार करना चाहिए ।ऐसी तरक्की ? ऐसी महा नाश लीला ? ऐसे इमारतों के खण्डहर और मलबा किस सफल जीवन की तलाश ? क्या शान्ति के लिए युध्द और मौत का तांडव ? इस तरह के बादलों से ही वास्तविक नफरत की जाना चाहिए ।इस तरह के सत्ताधारी से ही सबसे पहले नफरत और घृणा की जानी चाहिए ।जो मानवीय प्रेम और सह अस्तित्व को नुकसान पहुंचाए ।ये मनुष्यता के संस्कार नहीं है । जहां मनुष्यता पर ही प्रश्नचिन्ह लग रहा हो वहां सत्ता और सत्ताधारी किस तरह मानवीय हो सकते हैं उनका मनुष्य होना ही संदेह के घेरे में है ? सवाल तो इस समय भारत से लेकर विश्व की सत्ता पर काबिज हर नेतृत्व पर उठाये जा सकते हैं बस आदमी की चेतना ,विचार ,और अहिंसा के जागने की प्रतीक्षा तो करनी ही होगी ।जब आदमी अपने से मुक्त होकर पर के अस्तित्व के लिए ,पीढ़ियों के अस्तित्व की चिन्ता से बेचैन होगा तब वह इस अमानवीय शान्ति के माहौल पर भी वैचारिक रूप से अपनी चेतना को स्थिर कर पायेगा ? क्या हम शान्ति के लिए उन्माद , उच्छृंखल, मनोवृत्तियों पर विचार करना शुरू करेंगे ? बस स्थितियां यहीं से परिवर्तित होंगी ।।
विनीता रघुवंशी
