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प्रेम
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( ९ )
यदि तुम अपनी गंध ,
दमक ,सिहरन ,स्वर
और उष्मा नहीं बोती
तो ये जमीन
कहीं की भी
नहीं होती ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में प्रेम की ही जमीन का उल्लेख किया गया है ।प्रेम मनुष्य जीवन की ऊष्मा है । प्रेम ही वह ठोस धरातल है जहां आत्मीयता ,लगाव और अपनत्व का भाव फैलता पनपता है ।धरती अलग है और जमीन का मायना रुप आकार – प्रकार अलग है ।धरती भूमंडल और ब्रह्माण्ड का हिस्सा है उसमें उपजाऊ पन खान ,रेत , रेगिस्तान ,हरियाली ,पहाड़,चट्टान, शिलाएं और न जाने कितनी भांति भांति के रुप – स्वरुप बने रहते हैं ।परन्तु जमीन जब कहा जाता है तब उसमें नमी होती है ।उसमें ऊपजाऊ पन होता है ।खाद मिट्टी की गंध होती है । फसलों पर दमक होती है ।जमीन में स्पन्दन होता है उसके तृण तृण में सिहरन होती है ,और उसमें एक प्रेम का लगाव का अस्फुट स्वर समाया रहता है ।इस जमीन पर ही प्रेम की अनुभूति की उर्वरा क्षमता विकसित होती है ।यह सब प्रेम का भाव जमीन की नमी का ही प्रभाव है । मनुष्य की आत्मा में भी प्रेम की नमी होती है तब ही तो इस उष्मा को पाकर प्रेम उपजता है अन्यथा सब मानव मन रुपी भूमि बंजर और अपनत्व हीन होती ।यह असर मनुष्य के मन यदि कहीं से आया है तो वह जमीन का ही असर है ।यह जमीन ही संस्कार है ।यह जमीन ही संस्कृति है ।यही सभ्यता भर है ।यही शऊर है ।यही तो जमीन की ऊष्मा है जो मानव मन में प्रेम का संचरण करता है ।जमीन को तैयार किया जाता है ।पानी खाद मिट्टी देकर नमी पहुंचाई जाती है इसी प्रकार मानव मन को करुणा ,शांति,सेवा , सद्भावना,त्याग, संवेदना के भाव रुपी नमी गंध ,स्वर ,दमक याने आभा से परिपूरित किया जाता है । यही तो है मनुष्य की चेतना और विचार रुपी जमीन । यही तो है वह उष्मा जो प्रेम को पल्लवित ,पुष्पित करती है । यदि इस मानव मन रुपी भूमि में प्रेम न हो तो फिर इस जमीन का याने मनुष्य होने का भी कोई अर्थ नहीं है । प्रेम है तो मनुष्य भी है ,उसका अस्तित्व है ,उसकी अस्मिता है ,उसकी गरिमा है । यहां मनुष्य की गरिमा होने के गहरे अर्थ और संदर्भ जुड़े हुए हैं । मनुष्य यदि चेतना विहीन है मतलब वह केवल अपने अस्तित्व को उदर पोषण ,परिवार पालन ,आजीविका और धन संपत्ति के संचय तक ही अपनी दृष्टि सीमित रखें हुए हैं और समाज के स्वरुप में आती गिरावट , मर्यादा हीनता के प्रति सजग ,सचेत, नहीं तो फिर उसका जीवन मृत अवस्था में ही है । वह समाज चेतना के लिए जीवित नहीं वरन मृतक समान है ।यदि मनुष्य की चेतना और विचार समाज की बौध्दिक , वैचारिक , चेतना गत ,उन्नति की ओर चिंतन कारी है तो वह समाज सापेक्ष है ।वह समाज की उपेक्षा नहीं वरन समाज के लिए अपेक्षा , हितकारक है ।यह प्रेम की जमीन ही है जिसने मनुष्य को जमीन की तरह उष्मा से भरपूर अस्तित्व दिया है । जिसके पास जमीन की तरह रुप ,गंध ,स्वर, स्पन्दन ,आभा सब कुछ है । नमी है चेतना में प्रेम की । अनुभूति है आत्मा में करुणा की । द्रवणशीलता है संवेदना की ,त्याग की ऊष्मा है प्रेम की ।यही सब तो उपजाऊ पन है प्रेम की जमीन हो जाने का । मनुष्य होने का मतलब ही है प्रेम की अनुभूति से वाकिफ होने का । इसीलिए कबीर दास जी भी कहते हैं —” जा घट प्रेम न संचरे ,ता घट जानो मसान ” नफरत का कोई मतलब नही ,यह मनुष्य होने का पैमाना नहीं ,यदि होता तो फिर दुनिया में सभी मनुष्य और प्राणी मात्र परस्पर नफरत और घृणा ही करते ,सभी धर्म और सम्प्रदाय नफरत की ही शिक्षा देते ।हिंसा सिखाने के बहुत से बड़े बड़े स्कूल खुल जाते ? लेकिन हिंसा एक घातक विचार है समाज को नाश की ओर ले जाने वाला है इसीलिए तो प्रेम ही संसार और समाज का निर्माण करने वाला ठोस धरातल है ।यह बात विश्व पटल पर सुर्खियों में चलते युद्धों के घातक परिणाम पर विचार,चिंतन,मनन करके सबूत और प्रमाण पाये जा सकते हैं ।तब प्रेम की अहमियत का बोध आसानी से हो सकता है ।आज परस्पर लड़ने वालों को रोकने वाला कोई नहीं बल्कि उकसाने वाले बहुत हैं ।यह समझ लेना बहुत सरल और आसान है ।नफरत ने बहुत से घर – परिवारों को मिट्टी में मिला दिया तो प्रेम ने आपसी रिश्तों की अटूट गांठ बांध दी । यह है प्रेम की जमीन जो उष्मा से रची – बसी है । प्रेम ही मनुष्य और मनूष्यता का सृजन करता है ।प्रेम सृजन धर्मी तत्व विचार है ।
विनीता रघुवंशी
