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प्रेम
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( ८ )
कितना
घुला – घुला है पठार
हाथ हिला -हिला कर
टेर रहा लगातार
सुनो और
देखो उधर !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में प्रेम जीवन तत्व बनकर आया है ।प्रेम अब उबड़-खाबड़ नहीं है असमतल भी नहीं है ।समतल है मन में घुल गया है बिल्कुल पठार की तरह सपाट और सहज रस में भीगा हुआ ।प्रेम भी तब ही जुलता है ।अपने भाव – अस्तित्व को जताता है जब वह रोम रोम में समाहित हो जाता है ।यह भूमंडल की सहज स्थिति और भाव दशा है । जहां ऊंचाई – निचाई नहीं समरसता की सहजता है ।प्रेम सार्वभौम सृष्टि का नियामक है । जहां पराया और अन्य कोई नहीं होता सब अपनत्व के भाव में डूबे रहते हैं ।ऐसी भाव दशा में सब घुल-मिल जाते हैं और जो अलग छूट गया है उसे भी शामिल होने के लिए हाथ हिलाकर अपने पास बुलाया जा रहा है ।यह समीपता ही तो प्रेम की अवस्था है ।उस प्रेम की गहरी अनुभूति ही सरसता है ।अपनेपन में डूब जाने की स्थिति है ।जब हृदय के भीतर की कलुषता और मनोमालिन्य मिटेगा तब ही तो प्रेम आत्मा और अन्तर धारा को प्रभावित करेगा ।यह मनुष्य के हृदय में अन्तर लय की जो सरगम है वह प्रेम मय ही है ।यही अन्तर लय ही तो कृष्ण की बांसुरी का स्वर है ।यही तो है कबीर की फटकार और यही सूरदास की अनुभूति का जीवन्त अनुभव है ।प्रेम के उस समतल की आवाज को तो हर मनुष्य और हर जन को सुनना और समझना ही चाहिए ।यदि मनुष्य अपने भीतर जीवन को महसूस करना चाहता है तो उसे सफलता और अच्छाई में से कुछ चुनना ही होगा तब प्रेम एक अच्छाई है यही तो सफलता है मनुष्य की । मनुष्य सफल होने के लिए साधनों की पवित्रता का ख्याल भले उतना नहीं रखता जितना वह भलाई और हित कारी बनने के लिए रखता है ।सफलता के लिए मनुष्य हिंसा ,नफरत,स्वार्थ ,द्वेष ,ईर्ष्या का सहारा ले सकता है लेकिन भलाई और अच्छाई के लिए उसमें नैतिक आत्म बल बहुत जरुरी है ।आत्महीन स्थिति मनुष्य को हर समय और हर अवस्था में पतन के गर्त में ही डुबाएगी ।यह आत्महीन होने की अवस्था सफलता के शिखरों को छू लेने के बाद भी मनुष्य के सामने और आसपास मौजूद रहेगी ।जो मनुष्य नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करके भी अच्छाई और भलाई की ओर मुखातिब होगा उसके पास सदा प्रेम मय वातावरण रचा – बसा रहेगा । इसलिए यदि मनुष्य को किसी की आवाज ,स्वर सुनना ही है तो उसे नफरत की आवाज नहीं प्रेम की उठती पुकार पर विचार करना चाहिए ।यह प्रेम की वाणी ही मनुष्य के लिए अच्छाई का रास्ता है । मनुष्य की कुटिलता से ज्यादा समाज का भरोसा प्रेम पर है ,अपनत्व और आत्मीयता की चेतना पर है ।प्रेम ही वह सहज अवस्था है जिसमें कोई द्वैत नहीं होता ।अद्वैत की अवस्था ही आनंद की चरम अवस्था है ।यही अहिंसा है । मनुष्य मनुष्य में कैसा फर्क ,कैसा भेद ? यह विचारणीय सवाल है ।समाज की प्रेम की अवस्था ही समरस स्थिति और अवस्था और दिशा भी और दशा भी है ।घृणा , हिंसा समाज के विघटन के सूत्र हैं जिन्हें मनुष्य और समाज प्रेम से रसमय बना कर गूंथ सकता है ।नफरत अल्पकालिक विचार या स्थिति हो सकती है लेकिन प्रेम समाज की बुनियाद का ठोस आधार है । यह समाज की दूरदृष्टि में रहना चाहिए ।
विनीता रघुवंशी
