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प्रेम
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( ७ )
छितराने लगे मेघ और
शरद की धूप
काले लगे ऊन
आकाश में खुलकर ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में ऋतु परिवर्तन का संकेत और भू मंडल पर होते प्रभाव को इंगित किया गया है ।वर्षा ऋतु की बिदाई हो गई और मेघ की सघन स्थिति में बदलाव आ गया है ।अब मेघ बिखर गये हैं ।शरद ऋतु का आगमन हो चुका है ।हल्की हल्की ठंड माहौल में शुरु हो चुकी है ।शरद का चांद वातावरण में रोमांस और अनुराग के भाव विस्फारित कर रहा है । धूप पर भी ऋतु का असर घुल गया ।धूप ने अपनी तीखी वृत्ति को समेट लिया है ।धूप में उष्णता नहीं रही ।अब प्रेम के अन्दर गुनगुना पन आ चुका है ।शीत ऋतु के आने से पहले ऊन की गर्माहट और खण्ड से बचने के उपाय होने लगे हैं ।ऊन बनाई जा रही है ।याने धुनी जा रही है बुनने से पहले उसे बंटकर धागों की तरह बनाया जा रहा है ।यह शीत ऋतु से बचाव की चिन्ता है ।पृथ्वी और आकाश दोनों इस शीत ऋतु के आने से पहले ही आगाह हैं । धरती और आकाश में ऋतु परिवर्तन के संकेत हैं और उस्मान और ऊर्जा के स्रोत ऊन की गर्माहट को सूता जा रहा है ।बेटा जा रहा है ।यह ऋतु परिवर्तन मामूली नहीं है ।इसमें प्रेम की ऊष्मा है ।वर्षा की जोखिमें अब खतम हो चुकी है और वातावरण में रोमांच,प्रेम का अहसास हो रहा है ।मेघ अब निरभ्र हो चुके हैं ।प्रेम पर भी जो संकट था वह छंट चुका है ।पृथ्वी पर सब तरफ केवल खुलापन ही खुलापन है । निरभ्रता से धरती अनुगुंजित है ।प्रेम भी अब गोपन भाव में नहीं प्रकट भाव में प्रस्तुत है ।यही तो है प्रेम की अनुभूति जो रहस्यमय नहीं वरन हर जन के मन में प्रकट भाव में स्थित है ।प्रेम प्रकट भाव है जो आकाश की तरह विस्तीर्ण है। फैला हुआ है । वह प्रेम नहीं जो छुपाया जाए ।प्रेम तो हर हाल और अवस्था में उष्मा से और ऊर्जा से भरा होता है ।शरद ऋतु का आना याने रासमंडल का सज जाना । रासलीला और नृत्य के समूह का सौन्दर्य लहरी का उमंग आना ।क्या ये भाव सौन्दर्य और ऊर्जा का संचार नहीं ।समाज के अन्तर स्थल में समाई नफरत और घृणा का ऋतु परिवर्तन प्रेम में करने का यह वक्त नहीं ।ऊन की मैल और गंदगी को टालने का याने छोटी सी छड़ी से उलट – पुलट करने का समय नहीं ? यही तो वह ऋतु है जब मनुष्य अपने भीतर की घृणा कलुष भावों को प्रेम की तांत से उलट – पुलट सकता है ।मेघ छंट गये हैं ।आकाश निरभ्र हो गया है । मन के विकार शून्य होते ही मानस रुपी आसमान प्रेम के निखार से उजला हो गया ।शरद के चांद की तरह पूर्ण और चेतना की निर्मलता से दमक गया है । यही तो है प्रेम की सात्विक शक्ति जो पूरे भू मंडल को कान्तिमय बना देती है । शरद का चांद उजला और अमृतस्रावी ही नहीं होता वरन मन के भीतर रचे बसे विकृत भावों की भी निर्जरा करता है । आकाश स्वच्छ और निरभ्र होगा तब ही प्रेम जैसे पवित्र भाव की अनुभूति होगी ।ऋतु परिवर्तन के साथ ही मन – मानस परिवर्तन का भी दौर बनने लगता है ।यही तो है मेघ की छितराने वाली भाव दशा ,मन की सात्विक अवस्था जब तक मन में विकार मौजूद हैं तब तक मन में प्रेम का पावन भाव उदित नहीं होगा ।प्रेम की निष्ठा नहीं उपजेगी ।प्रेम ही सार्वभौमिक सत्य है ।
विनीता रघुवंशी
