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प्रेम
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( ६ )
ओह!
कितना कीचड़ यहां
अब हम
अपने खून पसीने से
उगायें कमल ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की इस लघु कविता में वैचारिक रूप से मनुष्य के चित्त को प्रेरित करने की चेष्टा की है –“ओह! कितना कीचड़ ” ये कीचड़ किस तरह का है ? विकारों और विकृतियों का ? अपराध और उच्छृंखल मनोवृत्तियों का ? ये किस तरह का कीचड़ है । मनुष्य की असंवेदनशील वृत्तियों का ? एक बार इस कीचड़ पर विचार करने की जरुरत है ।यह विचार ही एक सकारात्मक ऊर्जा का संचरण करेगा । यहां मनोवृत्तियों का कीचड़ है ? मिट्टी में उर्वर प्रज्ञा का भाव सृजित हो गया है तो कीचड़ का सही सृजन तो उसमें उगे कमल ही है । यहां कमल रुढ़ अर्थ में ग्रहण न किया जाये यह किसी भी तरह का कोई प्रतीक या पहचान चिह्न नहीं है ।यह कमल है सद्विचार रुपी धारणाओं का ! न यह सत्ता का ही प्रतीक है ।न किसी दल विशेष की ओर संकेत ।यह तो वैचारिक पवित्र भाव का संचरण भर है ।याने जहां वृत्तियों ने पूरी तरह लोभ ,लालच ,स्वार्थ ,लालसा , कामनाओं का चोला पहन लिया है वहां इस तरह की गंदगी भरी वृत्तियों को सद्विचार में परिवर्तित करने का उपक्रम शुरु किया जाये ।खून पसीना भी यहां इशारा है श्रम का संयोजन सृजन के लिए ।प्रेम का उपयोग समाज के निर्माण के लिए ।बंधुत्व का संदेश नफरत को मिटाने के लिए ।करुणा और संवेदना का संकेत – संदेश हिंसा मिटाने के लिए । यह है समाज में समरुपता स्थापित करने का रास्ता ।यही विचार ही भलाई के का विचार है ।परस्पर कुशल -क्षेम जानने की भावना है जो सामाजिक कदाचरण और उच्छृंखल होते समाज पर मर्यादा की डोर कसने का सिलसिला है ।क्या हम इस कीचड़ याने मर्यादा हीन माहौल को फिर से मानवीय अहिंसक बनाने की कोशिश नहीं कर सकते ? यह बदलना ही तो कमल की श्रेष्ठता , पवित्रता,और चेतना को पा लेना है ।यही तो पुष्पों में सबसे आकर्षक पुष्प और खिलने में सबसे कठिन परिश्रम की करके खिलने वाला यदि कोई पुष्प है और देवी -देवताओं को जो आल्हादित करता है ।कृपा की उदारता से जो परिपूर्ण है ।जो कविता की उपमाओं में आकर कविता को सराहनीय बना देता है । पुष्पों में जो कमलासन का प्रतिरुप है । ऐसे समाज की श्रेष्ठता की ओर ले जाने का मानस परिवर्तन ही तो कमल उगाने जैसा कर्म और श्रम है ।यही तो कीचड़ का रुपान्तरण है जिस समाज के पास कीचड़ है उसकी मनोवृत्तियों को सही मार्ग दर्शन देकर श्रेष्ठ क्यों नहीं बना सकते ? कीचड़ की ऊष्मा ,ऊर्जा का सही दोहन ही तो कमल जैसे समाज रुपी श्रेष्ठ समाज का निर्माण होगा । यह तो समाज चिन्तकों को ही विचार करना है यहां तक की हर समाज जन को अपनी श्रेष्ठता को समाज को समर्पित करना चाहिए ।यदि हर जन में बौध्दिक चेतना और बोध है तो उसे मनोवृत्तियों के कीचड़ को कमल रुपी श्रेष्ठ समाज की संरचना में सहायक होना चाहिए ।आज हम समाज के गिरते स्तर पर चिन्ताकुल तो हैं ,ठहाके और उपहास भी करते हैं लेकिन बदलाव के लिए सक्रिय प्रयास पर चिन्तन और मनन नहीं करते ।आज समाज का युवा नशे ,नफरत और बेरोज़गारी से जूझ रहा है क्या हम इस सबके लिए समान स्तर पर समाज में सक्रिय हैं ।यही अवस्था और स्थितियों का परिवर्तन ही कमल रुपी पुष्प के खिलने – खिलाने के लिए किया गया कठिन श्रम है ।इसके मायने हर नागरिक को समझना होगा ।
विनीता रघुवंशी
