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प्रेम
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(५ )
शहर में लगी
धारा के बावजूद
बहती एक धारा
मेरे भीतर कल – कल – – –
जिसमें नहाकर
तनी बन्दूको के बीच से
आप ही गया तुम्हारे पास
ताजातरीन ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-“ तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में मनुष्य के मन के भीतर बहती प्रेम की धारा का सरल परिचय दिया गया है ।हर मानव में प्रेम ही ऐसा सबल तत्व है जो किसी भी अवरोध और रुकावट को नहीं मानता ।प्रेम का भाव ही मनुष्य में हौंसला ,हिम्मत,और साहस पैदा कर देता है । हर आदमी के भीतर प्रेम एक अन्तर धारा के रुप में बहता रहता है ।जिसे चाहे वह सुने ,समझे या महसूस करें ,चाहे उसे अनसुना करें ,उससे दूर भागे ,उसे महसूस करने से बचता रहे लेकिन मनुष्य के मन में ,चित्त में आत्मा में जो आत्म संगीत की धुन है ,जो राग है ,जो लय है ,जो तल्लीन होने की अवस्था है वह और कुछ नहीं प्रेम ही का भाव है ।यही मनुष्य की चेतना का मूल स्वरुप है । आदमी जब अपने सब आवरण ,मिथ्या ,कुण्ठाओं , ग्रंथियों से बाहर आता है तो उसके पास जो केवल प्रेम की वास्तविक सम्प्रभुता , स्वायत फैलाव होता है । प्रेम की वह उत्कट दशा ही तो है जो मनुष्य को ताजातरीन बना देती है ।यह सत्ता की भूमिका में कानून का अनुशासन तोड़ना माना जाए लेकिन प्रेम का अहसास किसी भी सांसारिक रुकावट को स्वीकार नहीं करता ।प्रेम मानवता है वह करुणा की भूमि में उपजता है ।जब इलाकों में आवाजाही पर रोक लगी हो और सत्ता और शासन मिलकर आपदा खड़ी कर रहे हों ऐसे विकट समय में मानवता के हित में बंधनों को अनदेखा करके अपने मित्र ,प्रिया,प्रिय के हितार्थ समर्पित रक्षित भाव से उपस्थित हो जाना और उस पर ताजगी से लबरेज स्फूर्ति कितनी कितनी जीवंत और निर्मल है । यहां कोई स्वार्थ और लालच नहीं वरन चिन्ता ,फिक्र ,बेचैनी ,परवाह यह सब है प्रेम में ।यह दिखाई नहीं देता परन्तु समाया होता है प्रेम के भाव में ।यही ममत्व है ,यही करुणा है ,यही संवेदना है ,यही तो फिक्र है , यही सत्य है , यही बंधुत्व है , यही सखा भाव है , यही सृजन है ,यही सृष्टि है जो बनती है ,यही सौन्दर्य है ।यही भलाई और कल्याण है ।यदि प्रेम नहीं तो जीवन नहीं ।जीवन की पहचान है प्रेम । प्रेम मनुष्य के जीवन का पहला अनुशासन है ,पहला नियम और विधि है जीवन निर्वाह की ।प्रेम का परिचय है तो यही लोक संस्कार है ।यही लोक सभ्यता और लोक व्यवहार है ।प्रेम ताजा कर देने वाला भाव है युगों की उदासी – मायूसी को पोंछ देने वाला मन का संस्कार है ।
विनीता रघुवंशी
