5
प्रेम
*****
( ४ )
जब नहीं होती पास
तो होती एक कविता
ठीक तुम्हारी तरह
होने पर होती तुम
एक कविता
कविता की तरह ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —–” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
प्रेम एक संवेदनशील भाव अनुभूति है ।जब मन में समग्र संसार की चिन्ता ,फिक्र ,परवाह जाग उठती है तो सारा संसार और सृष्टि प्रियत्व से भर जाती है ।मानो समग्र संसार और सृष्टि ही प्रिया में परिवर्तित हो चुकी हो ।सृष्टि का कण – कण प्रेम मय भाव में निमज्जित हो चुका हो ।सृष्टि और प्रिय में भेद कहां रह गया ? दोनों एक मेक हो गये ।कुछ भी पराया या बेगाना नहीं रहा ।ऐसी दशा में प्रेम से रचा – बसा संसार ही यथार्थ हो जाता है ।यदि मनुष्य के मन में प्रेम उदित हो जाता है तो यह दुनिया का सबसे बड़ा भंडार है ।यही दुनिया की सबसे बड़ी दौलत का हासिल हो जाना है । इसीलिए तो रचना में कहा है कि जब प्रेम की अनुभूति प्रिय बनकर आ जाती है तो फिर कविता का अहसास उभर आता है । यहां कविता के मायने व्यापक अर्थ में लिए जाने चाहिए कविता का होना याने विचार का , संवेदना का ,करुणा का ,त्याग का ,सेवा का सहानुभूति का ,दुख दर्द का ,यातना का ,सत्य का ज्ञान आ जाना है ।यही तो ज्ञानात्मक संवेदन है । यहीं से कविता और प्रेम का आरंभ है । यहीं से साहित्य का मर्म शुरु होता है ।जब तक पर – पीड़ा का बोध नहीं तब तक वहां कविता भी नहीं होती । कविता का मर्म ही करुणा में समाया है ।प्रेम करुणा की द्रवणशीलता से युक्त चेतना है ।कविता और प्रेम एक दूसरे के परिपूरक हैं ।यदि मन में प्रेम की अनुभूति नहीं तो वहां कविता भी मौजूद नहीं होती ।प्रेम के अनुभव आ जाने पर करुणा का , संवेदना का बोध भी आ जाता है ।जब प्रिय पास है तो भाव संसार समृद्ध है और कविता का मन में मौजूद होना ही भाव की समृध्दता है ।समग्र संसार में प्रेम का अनुभव हो जाने पर मन के विकार ,द्वेष ,ईर्ष्या ,घृणा ,हिंसा सब नदारद हो जाते हैं मन विकृति हीन हो जाता है ।मन पावन हो जाता है ।मन निर्मल हो जाता है । जब विकार हीन सहृदय की पारस्परिकता ही पवित्र वातावरण का सृजन करती है ।यही तो प्रेम का कविता हो जाना है । प्रेम हृदय की निर्मलता का प्रमाण है ।प्रतीति है आस्था की । जीवन – धारा के प्रवाह का प्रमाण है प्रेम । मनुष्य भोजन ,पानी के बिना जीवित रह सकता है लेकिन बिना प्रेम के वह एक पल भी जीवित नहीं रह सकता ।प्रेम के बिना आत्म हीन हो जाना है ।आत्म हन्ता जीवन स्थितियों में जीवन को संरक्षित कर पाना बेहद मुश्किल है । जब प्रेम मन में बसता है तो मनुष्य समस्त संसार के लिए संरक्षण की कामना करता है ।प्रेम पा जाने के बाद मन की समग्र लालसा शून्य हो जाती है ।प्रेम अपेक्षा हीन होता है ।प्रेम में देय का भाव रहता है प्रेम में स्पर्धा नहीं होती । प्रेम उच्चावस्था की चेतना है ।
विनीता रघुवंशी
