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आइन्दा – तुम पूरी पृथ्वी हो कविता

by Dr. Vinita Raghuvanshi
आइन्दा
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उसकी जिंदगी में काम आने के लिए
उसे अपना लहू दिया
और वह जल्दी – जल्दी उसे
साबुन से धोने लगा
मैंने उसे टोंका —–
यह क्या कर रहे हो ?
प्रश्न को टालते हुए वह
खड़ा हो गया मेरे सामने
और हिकारत से देखते हुए बोला —
तुम्हारा खून ढेर सारा साबुन खाता है
तब जाकर साफ हो पाता है
आइन्दा अपना खून
हमारे माफिक कर लेना
इसलिए कि हमें
पड़ सकती है जरुरत
तुम्हारे खून की कभी भी किसी वक्त !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” तुम पूरी पृथ्वी हो कविता ” से उद्धृत )
आज की कविता में लहू की अहमियत और जरुरत का मिजाज बताया है ।आज भारत की राजनीति में जिस तरह की खुदगर्जी और स्वार्थ , लालसाएं, लोभ पनप गया है वहां आदमी की निष्ठा का कोई खास महत्व नहीं रह गया ।हर आदमी और उसकी निष्ठा ,उसकी देशभक्ति ,उसकी शहादत सब के प्रति राजनेताओं के लिए ,सत्ता के लिए ,बलिदान देश के लिए नहीं बल्कि सत्ता पर आसीन व्यक्ति के लिए ।हौंसला और हिम्मत केवल सत्ताधारी के हित और खुदगर्जी के लिए हो ।यह राजनीतिक यथार्थ है ।आज राष्ट चेतना का अर्थ सत्ताधारी के आसपास सिमट गया है । इसलिए निष्ठा की ,बलिदान की ,देशभक्ति की ,वफादारी की तौहीन होने लगी है ।आदमी को खबरदार किया जा रहा है अपने ईमान ,वफादारी,निष्ठा ,त्याग और भक्ति के प्रति ” आइन्दा ” शब्द का इस्तेमाल करके । यहां आइन्दा बहुत से अर्थ के दरवाजे खोल रहा है ।यह आम आदमी के लिए और जनता के लिए एक चेतावनी भरा शब्द है । जहां सत्ता केवल गूंगे ,बहरे ,और चेतना शून्य जनता की जरुरत महसूस करती है ।उसे अपने पक्षधर में कोई चेतना और स्पन्दन नहीं चाहिए ।उसे केवल सर झुकाए , हाथ बांधें ,दास चाहिए ।वह चेतना से , संवेदना से ,करुणा और विधि व्यवस्था पर कोई व्यर्थ चिन्तन ना करे ।यही तो है खून को सत्ता के माफिक कर लेना ? जो जनता सरकार और सत्ता के करिश्मों से चमत्कृत और बेजुबान होती रहे ।अपनी भूख और पीड़ा को माहौल में बजते संगीत की धुन और सरगम समझे ? यही तो माफिक होती दास -जनता और सत्ता की पक्षधरता है ।ऐसा लहू जो सत्ता के करतबों ,कारनामों ,झूठ और पाखंड पर सवाल उठाए , सत्ता से न्याय की अपेक्षा करें ,समानता के लिए दबाव बनाए ,अपनी स्वायत स्थिति और स्वतंत्रता के लिए जागरुक हो ? यह नागरिक चेतना सत्ता के लिए ख़तरनाक होती है ।इसी को तो सत्ता हिकारत से देखती है ? यही चेतना तो खुदगर्ज सत्ता के लिए ख़तरनाक और राष्टद्रोही होती है ? इस तरह की जनता के खून को सत्ता अपने पर लगे दाग – धब्बों की तरह मल- मलकर साफ करती है ? यह है सत्ता की अनदेखी और उपेक्षा ? वह राष्ट्र पर प्राण न्यौछावर करने वाले वीरों को ,शहीदों को , बलिदानियों को , सम्मान और पुरस्कार और वीरोचित अलंकरण नहीं देती ।सत्ता के लिए वीरता का मायना है सत्तासीन के लिए ,दल के लिए ,पार्टी के लिए की गई कुर्बानी का ? यहां राष्ट्र का मायना छोटा हो जाता है और सत्ता का कद देश के सामने बड़ा हो जाता है ।कविता में जिस मूल बिन्दु को विचारणीय बनाया गया है वह यही है ।हर हाल और हर स्थिति में ,हर अवस्था में देश का अस्तित्व और अस्मिता राज नेता ,दल ,पार्टी आदि से महत्वपूर्ण और कद हर हमेशा ऊंचा है और रहेगा ।देश की सम्प्रभुता , सम्मान और स्वतंत्रता हर हाल में राष्ट्रीय जन नेता से ऊंची और महत्वपूर्ण होती है । बहुमत के मद में या अहंकार के अन्धेपन में देश की इज्जत ,गरिमा को नुकसान नहीं पहुंचा सकता ? देश की गरिमा ,गौरव हर समय महत्ता की दृष्टि से बेहद जरुरी है । व्यक्तिगत निष्ठा राष्ट्र के समक्ष छोटी और नगण्य है । उसका कोई मूल्य नहीं ।देशभक्ति और देश चेतना हर समय मूल्यवान है ।देश का हर नागरिक अपनी कुर्बानी और बलिदान मातृभूमि के लिए खुशी – खुशी देता है ।यदि कोई राजनेता ,संगठन, या दल व्यक्ति – निष्ठा को महत्व देता है तो यह सबसे बड़ा राष्ट्रद्रोह समझा जाना चाहिए । राष्ट्र के सामने सभी व्यक्तिगत हित बेमानी होते हैं ,और हर त्याग बहुत ही महत्वपूर्ण और संवेदनशील भरा होता है ।आइन्दा अपनी कुर्बानी ,त्याग, देशभक्ति में जरुरत की तरह फर्क और अन्तर को जाने – समझें । राष्ट्र हर राजनेता से बड़ा महत्वपूर्ण,और ऊंचा है ।आपका लहू भी बहुत कीमती है ।हर किसी के लिए उसे लुटाया नहीं जा सकता ।उसे समर्पित भी नहीं किया जा सकता है । 🙏विनीता रघुवंशी

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