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June 2024

इन्द्रधनुष रचकर ************** महानगरों के धुएं से काला पड़ता सूरज गांवों के सिवानों तक आया तो उसके चेहरे पर दमकती लालिमा फैल गई चूम लिया नदियों ने हाल और बलखाती …

पराधीन हाथों से ************* कहां बना कोल्हू कहां बना मुठिया कहां बैल के आंखों की पट्टी यह सोचता बैल की तरफ देखता हकैया फिर सोचता —तिलहन तो उसके ही देस …

बिछौना ******* पहाड़ खोदा और बिछी हुई जमीन मिली उसके नीचे नदी में पैठा और रेतीली चादर ढंकीं सेज मिली वहां पेड़ों की जड़ों तक गया और वहीं मिली वत्सल …

गमले ****** अपने आप से बातें करते गमले अपनी ही मुट्ठी भर दुनिया में मुग्ध हैं जब भी आज बैठती तितली तो ये अवाक- से देखते रहते पंख उनके जिनसे …

अपने -अपने ठांव *************** पांव में लिपटी नदी चली आई मेरे साथ शहर चली आई खेतों की महक आंगन की जोति चौखट की बंदनवार मेरे साथ जो देखना चाहते महानगर …

मां की आंखों में ************** कितनी भी दूर रहे मां हमें आंखों में समाए रहती और उन्हें भी जो अधसिले झंगें – टोपी छोड़ जन्म के साथ ही मर गए …

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