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June 2024

सच से बड़ा लगा झूठ ****************** झूठ उस वक्त सच से बड़ा लगा जब दो जून से भूखी मां ने भर पेट डकारें लेते प्यार से बेटे की थाली परोसी …

ज्ञानात्मक संवेदन *************** समोती रही रोम रोम में अवकाश फिर चहकती हुई पंख खोले उड़ चली अपने आकाश में चिड़िया । ( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ——“ …

संवेदनात्मक ज्ञान ************** तुम्हारी हथेलियां सहलाते पहली बार लगा कि पहले पहल किस तरह आदि कवि ने हाथों में लिया होगा भोजपत्र और पहली कविता रचकर किस तरह अंगुलियां फेरते …

पिता का चित्र ************ जब सो रहा होता घर पिता का चित्र जागता सहलाता परिवार के स्वप्न रात भर रखता दिनचर्या पर संतुलन और घड़ी की टिक टिक पर धड़कता …

रुमाल की थकी देह *************** धोकर आंगन में फैला दी हंसी अपनी और चिड़ी कर रुमाल की तरह खींसे में रख निकल पड़ा काम पर घर लौटा तो पाया कि …

मिट्टी को ****** खेत पर काम करते अचानक ऐसा हुआ कि मिट्टी को हाथ में लेते ही ध्रुवांतों तक फ़ैल गया झनझना उठी रोम – रोम में रोशनी की सितार …

अधिकतर ********* जब भी गढ़ते पांव में कांटे अधिकतर — मंजिलें ही घायल होती जब भी उचटती नींद अधिकतर सपने ही आहत होते जब भी एकांत में ठगता स्वजन अधिकतर …

भोर तक ********* बाड़े के पेड़ को छुआ तो कहता रहा गिलहरी जैसा कूकता रहा कोयल जैसा लगातार तभी जाने क्यों उसके मन में कुल्हाड़ी का ख्याल आया तो छुगनी …

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