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गमले-नर्मदा की लहरों से

by Dr. Vinita Raghuvanshi
गमले
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अपने आप से बातें करते गमले
अपनी ही
मुट्ठी भर दुनिया में मुग्ध हैं
जब भी
आज बैठती तितली
तो ये अवाक- से
देखते रहते पंख उनके
जिनसे झर रही होती
पहाड़ और जंगल की गंध
इससे पहले कि
कुछ संवाद हो
बाग – बगीचों – मैदानों की तरफ
उड़ जातीं तितली
और अपनी ही परिधि में
बैठे गमले
मौन ही रहे आते ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ——“ नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में अनुभव की एक खुली दुनिया है जो तितली के हिस्से में है और एक परिधि ,सीमा में बंधा हुआ अनुभव है जो गमले के पास है ।जो बस अपने दायरे में बंधा है ।यह अनुभव के भीतर की स्थिति है ।जो मनुष्य केवल अपने घर की चारदीवारी में ही समग्र संसार की अनुभूति ,आत्म ज्ञान को ही अपना विस्तार मानता है ।वह चैतन्य होते हुए भी परिपक्व नहीं होता ।वह केवल अपनी उन्नति को ,अपने विस्तार को आत्म मुग्ध होकर महसूस करता है लेकिन उसके पास ,उसकी अन्तरात्मा में वैचारिक , संवेदना,करुणा का स्तर और अनुभव बहुत कम होता है । उनकी वैचारिक और काल्पनिक दुनिया बहुत सीमित होता है ।जब तब कोई घूमा – फिरा व्यक्ति वह चाहे स्त्री हो या पुरुष जब अपनी घुमक्कड़ी के अनुभव ,किस्से सुनाता है तो ये अवाक-से उन्हें देखते और सुनते रहते हैं ।इनके लिए चारदीवारी को छोड़ पाना बेहद मुश्किल और कठिन काम होता है । परिधि में रहना हर समय अच्छा नहीं होता ज्ञान पाने के लिए अपनी धारणाओं , अनुभवों , आस्थाओं ,विचारों के दायरे से बाहर आना होता है ।आकाश भर उजाला अपनी जड़ों तक पहुंचाने के लिए अपनी छोटी सी मनोनुभूति को ,दायरों को छोड़ना पड़ता है ।बिना मुग्धता की अवस्था से बाहर निकले ज्ञान ,बोध ,समझ ,विचार की कोठरियों के दरवाजे नहीं खुलते ।बाहरी दुनिया हर समय परिधि में बन्द धारणाओं और अनुभव संसार को चमत्कृत करती है । जब जब भी आदमी ने अपने आत्म विस्तार के लिए परिधि को पार किया है उसके उसे बेहतर परिणाम ही मिले हैं । ज्ञान को सीमा में नहीं बांधा जा सकता है हां सूचनाएं हमेशा दायरों में बंद की जा सकती है । ज्ञान की प्यास हर हमेशा आदमी को सीमातीत बनने को उकसाती है लेकिन दायरे आदमी को संकुचित और चारदीवारी में ही बांधें रखती है । गमले जंगल का अबूझ विस्तार नहीं दे सकते ।न ही पहाड़ की ऊंचाई और महक ही उनके भीतर महसूस की जा सकती है ।आदमी भी एक गमला ही है जिसके पास धारणाओं ,आस्थाओ ,विचारों ,का अनुभव संसार बंधा हुआ है जब तक उसके अन्दर जिज्ञासा याने जानने की इच्छा जागृत नहीं होगी तब तक वह कर्म शीलता और आत्मानुभव से विरत ही रहेगा । आदमी को ज्ञान के लिए परिधि का त्याग करना होगा ।या वह केवल सूचनाएं पाकर समाज में सजावट की वस्तु ही बना रहे जैसे गमले होते हैं ।आदमी को , मनुष्य को आत्म चिंतन तो अपने लिए करना ही होगा कि उसके लिए ज्ञान ,चेतना की स्थिति उपयुक्त है या केवल सूचना ही पाकर आत्म तुष्ट बने रहना ही बेहतर है। सूचना बदतर दशा होती है ज्ञान बेहतर अवस्था बनाती है आदमी के लिए ।आज का समाज सूचनाओं के बदतर समय में जी रहा है यही उसकी भ्रमात्मक स्थिति है ।यही आत्म मुग्ध स्थिति है ।वह ज्ञान के धरातल पर जा ही नहीं पा रहा है ।क्योंकि उसने खुद के प्रयास ,जानने की यात्राएं ,जिज्ञासा को उत्पन्न ही नहीं होने दिया ।जो कुछ उसके सामने खोल कर बिछा दिया उसे ही जादुई मानकर वह अपनाने लगा । ज्ञान खुद के प्रयास से मिलता है ।उसे खोजना पड़ता है और सूचनाएं हमेशा प्रसारित की जाती है बिना श्रम के मनुष्य के पास पहुंच जाती है । यह अफवाह ,समाचार ,खबर सच्ची – झूठी गप्प कुछ भी हो सकती है । सूचनाओं का जाल होता है लेकिन ज्ञान की धाराएं होती हैं ।
🙏विनीता रघुवंशी

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