Home आज की कविताबिछौना-नर्मदा की लहरों से

बिछौना-नर्मदा की लहरों से

by Dr. Vinita Raghuvanshi
बिछौना
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पहाड़ खोदा
और बिछी हुई
जमीन मिली
उसके नीचे
नदी में पैठा
और रेतीली
चादर ढंकीं
सेज मिली वहां
पेड़ों की
जड़ों तक गया
और वहीं मिली
वत्सल गोद लिए
बिछौना है जमीन
सबके लिए
उनके लिए भी
जो खुद बिछौना हैं।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ——“ नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में तंज भी है और यथार्थ भी है ।पहाड़ को खोदा जाए तो उसके नीचे समतल चिकनी जमीन मिलती है बिल्कुल साफ बिस्तर की तरह रेशम सी बिछी धरती होती है ।इसी तरह जब नदी में धंसा जाता है स्नान के लिए तब वहां रेत की मुलायम शय्या मिलती है ।नदी की वह मुलायम रेत सेज सी महसूस होती है ।पेड़ों की जड़ों तक में धंसी धरती मां के वात्सल्य से भरी महसूस होती है ।धरती सब के लिए बेहद जरुरी है ।बस इस पंक्ति के बाद एक बारीक सी तंज की लकीर खिंची हुई लगती है —“उनके लिए भी
जो खुद बिछौना हैं । ” यह पंक्ति संकेत है उन सत्ता के चापलूसी करते वर्ग के लिए जो सत्ता के सामने समर्पण करते करते खुद बिछौना बन जाते हैं । उनके लिए भी जमीन एक बिछौना याने शय्या ही तो है । मनुष्य जीवन में चाहे जिस तरह का कर्म करें चाहे वह पहाड़ खोदे ,नदी की गहराई में उतरे या पेड़ों की जड़ों तक अपना अस्तित्व जताए उसे सब जगह जमीन ही बिछी हुई मिलेगी ।वैसे भी आदमी को अपनी शख्सियत बनाने के लिए भी मनुष्यता के ठोस तत्व और सत्य की बेहद जरुरत होती है ।यदि मनुष्य या आदमी इन सत्यों से परिचित नहीं तो उसकी शख्सियत केवल हवा में ही तैरती रहेगी । इसीलिए आदमी को अपनी शख्सियत बनाने के लिए करुणा , संवेदना,सत्य, अहिंसा ,त्याग ,सेवा और सहिष्णुता के गुणों जैसी जड़ों के नीचे की मुलायम रेशमी बिछौने का आसरा तो चाहिए ही ।बिना सहारे के व्यक्तित्व की चेतना का प्रस्फुटन नहीं हो सकता ।आदमी चाहे जहां का सफर करे,चाहे जहां के स्थान की खोज करे ,चाहे जहां मेहनत और परिश्रम के करतब दिखाए लेकिन उसे अपनी पहचान ,अपना अस्तित्व ,अपनी अस्मिता बताने के लिए यथार्थ की जमीन पर तो उतरना ही होगा ।बिना सच के कोई भी व्यक्ति अपना वजूद नहीं बना सकता ।यह जमीन उसके पास दो तरह से आती है एक आदमी की वैचारिक जमीन यही उसकी वास्तविक पहचान है ।वह क्या सोचता है ? उसकी कर्मशीलता कैसी है ? क्या है ? बदलाव की धारणा क्या है ? उसका परिवेश कैसा है ? इन सबसे आदमी की जमीन पकती है ।यही आदमी को देखने का नजरिया होना चाहिए ।कल्पना ,सपने और सच्चाई में दृढ़ता ,चेतना ,कर्म का समन्वय होना चाहिए तब ही एक शख्स ,एक व्यक्ति,एक आदमी विश्वसनीय हो पाता है ।व्यक्ति का लोक व्यवहार और लोक चेतना और लोक संवेदना भी आदमी की एक ठोस जमीन बनाती है ।यह जमीन ही तो है उसकी पहचान ।पहचान के बिना आदमी की कोई अस्मिता भी नहीं होती ।हर आदमी मनुष्यता की जीती जागती पहचान और प्रमाण है ।यदि कविता के भीतर के संदेश को ग्रहण किया जाये तो यह है मर्म उसका कि आदमी के सभी कर्म – अकर्म भरे जीवन का अन्तिम बिछौना जमीन ही होती है यही अन्तिम सत्य भी है लेकिन यह उस अर्थ में भी बहुत ज्यादा सार गर्भित है कि आदमी के सभी कार्य व्यवहार लोक गामी होने चाहिए ।लोक हित में किए कार्य विराट चेतना ,विराट व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं ।बिछौना कितना ही कीमती हो उससे ज्यादा वह तब कीमती और मूल्यवान हो जाता है उसपर विश्राम करने वाली शख्सियत की दृढ़ चरित्र,और सत्य निष्ठा है ।अन्यथा शय्या तो शय्या है जो जीवन से मृत्यु तक के सत्य और असत्य को एक समान सहेजती है ? बिछौना आराम के लिए है आलस्य और भोग उसकी नियति नहीं होती ।बिछौना जरुरत है काम से विराम के बाद की स्फूर्ति और ताकत संजोने के लिए ।सत्ता और समाज इसका इस्तेमाल शोषण और व्यवसाय के लिए करता है ।जमीन हर मायने में आदमी के लिए सबसे अच्छा बिछौना है ।
🙏विनीता रघुवंशी

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