Home आज की कवितापराधीन हाथों से-नर्मदा की लहरों से

पराधीन हाथों से-नर्मदा की लहरों से

by Dr. Vinita Raghuvanshi
पराधीन हाथों से
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कहां बना कोल्हू
कहां बना मुठिया
कहां बैल के आंखों की पट्टी
यह सोचता
बैल की तरफ देखता हकैया
फिर सोचता —तिलहन तो उसके ही देस के हैं
जिन्हें खली के मोल खरीदकर
किसान का तेल तो पहले ही निकाल चुके आढ़तिये
और अब जो निकल रहा
उसे अपने दाम खरीद लिया बाजार ने पेशगी
घानी में तिलहन ओरता
अपने ही बैल के साथ
गोल गोल चक्कर लगाते सुनता
गांव के स्कूल से उठते जन- गण- मन के स्वर
और बार बार बोली जाती भारत माता की जय
सोचता इसी जयकार पर हकैया
और पराधीन हाथों से
पसीना पौंछते चलाए जा रहा कोल्हू ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ——“ नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में किसान – जीवन की व्यथा और वेदना के यथार्थ को उकेरा गया है ।कोल्हू कविता में शोषण का प्रतीक बनकर आया है ।कोल्हू तेल निकालने के लिए एक परिपाटी से चला आता उपकरण है ।हकैया यहां शोषित मनुष्य के विवेक का प्रतिनिधि है ।वह सोच रहा है घानी और कोल्हू की खोज या ईजाद न जाने कहां और किसने की यह एक पुराना यंत्र है जिसमें बैल की ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाता है ।न जाने किस बढ़ई ने मुठिया बनाई जिस पर दबाव बनाकर या पकड़ कर कोल्हू चलाया जाता है । और न जाने किस बुनकर ने पहले पहल बैल की आंखों पर बांधने के लिए पट्टी बनाई जिससे गोल गोल घूमने में बैल को चक्कर न आये ।इस सारे चित्रण में महाजनी सभ्यता के वे सभी पहलू अपने आप उजागर हो जाते हैं। जिनकी चर्चा मार्क्स करते हैं या विश्व व्यवस्था की क्रूरता भरी बाजार व्यवस्था जो मनुष्य के समस्त परिश्रम को अपने पंजों में दबोचे हुए हैं ।आदमी भी धन की चाह में कोल्हू के बैल की तरह गोल गोल चक्कर लगाता रहता है ।जब से विश्व में धनतंत्र या पूंजी का चमत्कार स्थापित हुआ है तब से आदमी केवल और केवल दास ही बन पाया है ।हमारे देश की और विश्व की सभी सत्ताएं पूंजी के बल पर ही निर्भर हैं ।इसी बाजार और पूंजी के मेल से जो शोषण के तरीके ईजाद हुए उनमें यदि सबसे ज्यादा शोषण होता है तो वह है किसान का ।जो जी तोड़ मेहनत करता है लेकिन जब फसल आती है तो उपज खरीदने आढ़तिये याने दलाल ,बिचौलिए सक्रिय हो जाते हैं। किसान की उपज की गुणवत्ता दलाल तय करते हैं और बाजार से सीधा मुनाफा कमाते हैं ।परिश्रम किसान का ,रात – बिरात जागरण किसान का सिंचाई किसान के द्वारा लेकिन उगाही पर ,उपज पर दांव बिचौलिए का । यहां हकैया का विचार करना कि तिलहन तो मेरे देस के ही हैं फिर खली के दाम पर याने कम कीमत दाम दे कर किसान का तेल निकाल चुके आढ़तिए ।सचमुच फसल का वाजिब दाम तो किसान को लगाना चाहिए लेकिन कीमत कौन आंक रहा है आढ़तिए , बिचौलिए,और दलाल या एजेंसी ।यह सब बाजार व्यवस्था का खेल है जहां किसान स्वतंत्र और स्वायत्त होते हुए भी पराधीन है ।शोषण का शिकार है ।वह स्कूल से उठते जन- गण- मन के स्वर को सुनता है लेकिन जन यहां गण कहां है याने माननीय कहां है ? किसान को पूरी व्यवस्था हिकारत और मजदूर मानती है ।उसके श्रम पर उसका हक नहीं ,वह स्वाभिमान का हकदार नहीं वह उस शोषणकारी बाजार व्यवस्था का दास बना हुआ है उसकी दिक्कत यह है कि उसके पास उपज तो है लेकिन रखने और बेचने के संसाधन पर पराश्रित है ।उसका अपनी कोई बाजार व्यवस्था नहीं , उसके खेती के उपकरण ,खाद ,बीज की आत्म निर्भरता नहीं ।उसे आधुनिक तकनीक चाहिए तो बाजार व्यवस्था भी आधुनिक होनी चाहिए ।आत्म सम्मान के प्रति सचेत और सजग होना चाहिए । उपज मण्डियों में तौल में ठगी सहना पड़ता है ।इसके पीछे कारण है किसानों की परस्पर प्रतिस्पर्धा और एक जुटता ना होना ।किसान संगठनों के अभाव। यदि संगठन है भी तो उनमें हित चेतना नहीं है ।अलग अलग जगहों के किसानों में परिचय का अभाव ,भौगोलिक स्थितियों की भिन्नता , अतिवर्षा,अवर्षा, पहाड़ी जमीनें आदि ऐसी बहुत सी दिक्कतें हैं जिनका सामना किसान को करना होता है ।उस पर यह उदघोष —” भारत माता की जय ” का जयकारा है और शोषण का कोल्हू गतिशील है ।यदि ऐसा नहीं होता तो बरस भर से किसान आन्दोलन रत हैं क्या उनके मन की बात गण नहीं सुनते ।जन तो यह निर्णय भी नहीं ले सकता कि एक बरस फसल नहीं उगाई जायेगी ? एक बरस फसल नहीं बोली जायेगी क्योंकि फसल का आना ही तो किसान की आजीविका है ।उसका कर्म है ।फसल के कारण ही तो वह भूमिपुत्र है ।सचमुच जो बाजार व्यवस्था के नियंत्रण के तरीके ईजाद किये गये वे सब पूरे विश्व में एक समान है ।सब यहां के और वहां के किसान भूमिपुत्र सत्ता और व्यवस्था से संघर्ष रत हैं । किसान यदि किसान की मजबूरी ,श्रम का महत्व नहीं समझेगा और केवल खुदगर्जी पर टिका रहेगा तब तक वह हर समय हर काल में पराधीन हाथों से पसीना पौंछता हुआ केवल कोल्हू के बैल की तरह चक्कर काटता रहेगा कभी राजनीतिक व्यवस्था के आसपास तो कभी आढ़तियों ,बिचौलियों , दलालों के,व्यापारियों के आसपास ।दिल्ली की सड़कों पर कीलें ठोंक कर किसानों के सत्ता तक पहुंचने के जो रास्ते रोके गये वह भी प्रमाण है गण माननीयों के सामने किसान जैसे जन की हैसियत को नकारना? किसान जन भी है गण भी है याने सत्ता धारी भी है और उसके पास श्रम का मन भी है ।हौंसला भी है ।वह अन्न -देवता की हैसियत रखता है ?
क्या इसमें समाज को संशय है ?या सत्ता इनकी शक्ति और सृजन – धर्म से आशंकित है ? कुछ तो भ्रम है जो सत्ता इनका घोर अपमान कर रही है ?
🙏विनीता रघुवंशी

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