Home आज की कविताइन्द्रधनुष रचकर-नर्मदा की लहरों से

इन्द्रधनुष रचकर-नर्मदा की लहरों से

by Dr. Vinita Raghuvanshi
इन्द्रधनुष रचकर
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महानगरों के धुएं से
काला पड़ता सूरज
गांवों के सिवानों तक आया
तो उसके चेहरे पर
दमकती लालिमा फैल गई
चूम लिया नदियों ने हाल
और बलखाती ले चली
प्रपातों तक
जहां कूदती फांदती धारों संग
इन्द्रधनुष रचता
किनारों तक खड़े वन की
खुशी में
शामिल हो गया सूरज
फिर बदन की ऊष्मा महकाता
जा पहुंचा
सागर की लहरदार सेज पर
रात भर के लिए ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ——“ नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में सूर्यास्त का सौन्दर्य अभिव्यक्त किया गया है ।सूर्य की किरणों में सात रंग भरे हैं ।बादल बारिश और सूर्य मिलकर आकाश में जो सतरंगा अर्द्ध गोला कार की रचना करता है उसी को इन्द्रधनुष कहा जाता है ।यह सूर्य का अपना अदभुत सौन्दर्य है जो अक्सर बरसात में दिखाई देता है ।यह प्राकृतिक सौन्दर्य दृश्यमान तो शहरों और महानगरों में भी होता है लेकिन वहां इसे निहारने की फुर्सत नहीं है और न वहां की दशा ही ऐसी है कि बड़ी बड़ी इमारतों, भवनों , अट्टालिकाओं,और चारों ओर कारखानों ,मिलों,खेतों से उठते धुंए की धुंध से अपनी चमक खोता सूरज एक धुंधली आकृति में नजर आता है ।प्राकृतिक सौन्दर्य का सच्चा नजारा तो गांवों के निरभ्र आसमान में ही देखने को मिलता है । वहां कम ऊंचाई वाले छोटे घर हैं ,खुली दालान और आंगन है ।आसमान तक पहुंचती निगाहें हैं ।साफ – स्वच्छ पर्यावरण है । जैसे ही गांव की सीमा में दाखिल हुआ सूरज तो नदियों ने ममता से ओत-प्रोत होकर उसके भाल को चूम लिया ।याने गांवों की नदियों के स्वच्छ जल में सूरज का अक्स प्रकट हो गया । नदियां चंचल है और उनके रास्ते पहाड़ समतल,मैदानों ऊंचे नीचे रपटीले रास्तों से गुजरती नदियां सूरज को ले चली थाम कर वन प्रान्तरों ,जंगलों के साथ उनकी खुशी ,उत्साह में भी घुल मिल गया सूरज वन की घनी गव्हर घाटियों , वनस्पतियों के झुरमुटों में अपनी ऊष्मा की महक पसार कर नदियों संग सागर तक पहुंच गया सूरज । सूरज के विश्राम के लिए सागर ने लहरदार शय्या की व्यवस्था कर रखी है ।यह चित्र कितना मोहक और अभिसार के मद से भरा है ।जब दिनभर की थकान मिटाता सूरज अस्ताचल गामी है तो उसकी यह यात्रा नदियों पहाड़ों वनों से होती हुई सागर तक होती है लेकिन उसके सामने शहर और महानगरों का प्रदूषण एक बहुत बड़ी किठिनाई भी है ।महानगरों में सांस लेता आदमी खुद बहुत सी बीमारियों ,रोगों ,धूल ,धुएं को सहता हुआ अपनी जीवन शक्ति को रोज ब रोज खो रहा है ।ऐसे प्रदूषण युक्त वातावरण में प्रकृति भी अपनी ऊर्जा ,अपना सौन्दर्य , अपनी जीवनी शक्ति खो रही है ।नदियों के फैलाव को आदमी के लालच और स्वार्थ ने सीमित कर दिया है ।महानगरों में नदियों की पतली धारा और उसमें भरी गंदगी को ,बदबू को खूब अच्छी तरह से महसूस किया जा सकता है ।शहर,नगर, महानगरों में आबादी बनी आदमी की बस्तियां पर्यावरण की चेतना से अनजान और धन के पीछे भागती -दौड़ती भीड़ के अलावा कुछ भी अपना परिचय नहीं देती । न कोई चिन्ता है न कोई चेतना और न ही कोई वैचारिक समझ -बोध । सरकार अपनी योजनाओं की ,स्वच्छता के अभियान शासकीय स्तर पर चलाती भी है तो वह सब भी भ्रष्टाचार के पनालों में बहकर खुद गंदगी से भर जाता है ।जनता में नागरिक चेतना का अभाव है ।वह अपने अस्तित्व को ,देश के अस्तित्व को और समाज के अस्तित्व को सत्ता के पक्ष – विपक्ष हित के साथ जोड़ कर देखती है ।वह चुनाव दर चुनाव अपने नागरिक अस्मिता का गला घुटते हुए देखती है और आत्म विस्मृत होकर अपने पर्यावरण ,अपनी नैतिकता ,अपनी मूल्य चेतना के प्रति असावधान और लापरवाह होती जाती है ।जैसे उसके आसपास ,उसके सामाजिक संबंधों का जीवन, उसके नागरिक हित का ख्याल रखना सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी हो ।पर यह तथ्य एक दम निरर्थक है ।हमें खुद अपने समाज ,अपने पर्यावरण ,अपने आसपास के वातावरण के प्रति सजग और सचेत रहना होगा ।जिस शहर के हम वाशिंदे हैं वह शहर हमारी पहचान और हमारा परिचय है । हमारी जीवन शैली का उद्घोषक तो शहर की आबोहवा होती है । हमारे शहर ,महानगर में रहते हुए हम उसके प्रति क्या भाव ,क्या विचार और किस तरह की चेतना रखते हैं यह हमारी पर्यावरण के प्रति प्रेम और चेतना तथा संवेदनशीलता से ही प्रकट होगा ।वरना रोज सूरज उदय होगा धुएं से रोज उसका चेहरा काला पड़ता जायेगा परिणाम यह होगा कि महानगर हमेशा उसकी ऊष्मा से ऊर्जा से वंचित होते जायेंगे ।अभी भी शहर कृत्रिम ऊर्जा स्रोतों पर ही आश्रित है ।क्या हम अपने पर्यावरण के प्रति सचेत होंगे ? ? ?
🙏विनीता रघुवंशी

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