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मन करता
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मन करता पूरी पृथ्वी को
कंडे की राख से मांजकर
झकझकाट कर दूं
मन करता नदियों की देह पर
गांव की माटी का लेप लगा
कुएं के मीठे पानी से सपड़ा दूं
मन करता पहाड़ों – पठारों – मैदानों को
खजूर की झाड़ू से बुहार दूं
मन करता आदमी के अन्दर तक जाकर
सारा खून साफ कर दूं उसका
मन करता सौर मंडल के
तमाम ग्रह -नक्षत्रों की
गर्द झटकार दूं
मन करता ज़र्रे ज़र्रे को
अपनी असल चमक दिलाने
आप सभी को साथ लेकर
भरपूर ताकत से चल पड़ूं इसी वक्त ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ——“ नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में भौगोलिक ,मानसिक, वैचारिक ,भौतिक जगत के प्रदूषण से उपजी उस स्वच्छता की चाह है जो आदमी के जीवन पर खतरनाक असर डाल रही है ।सचमुच जब प्रदूषण और गंदगी पर फिक्र होने लगती है तब यही मन करता है कि पृथ्वी को साफ कैसे किया जाये ? पृथ्वी का अस्तित्व ही गंदगी से समाप्त होने की स्थिति में आ गया है ।आदमी को पृथ्वी पुनः रहने लायक बनाने के लिए याने साफ हवा ,साफ पानी,साफ मिट्टी ,साफ ब्रह्माण्ड ,आसमान भी दूषण रहित चाहिए । इस रोग ग्रस्त धरती पर सांस लेते हुए और बीमारियों और दैहिक ताप को सहते हुए मन नहीं करता कि सारा वायुमंडल स्वच्छ और निर्मल हो ? मन करता पूरी पृथ्वी को कंडे की राख से मांज देने का कंडे की राख में प्रदूषण मिटाने की क्षमता होती है ।वह जीवाणु नाशक होती है ।उसके उपयोग से बर्तन और वस्तुएं पूर्णतः रोग विहीन होती है ।यह कंडे की राख का गुण है । इसीलिए पृथ्वी को भी कंडे की राख से मांजने की चर्चा की जा रही है कि यह भी विषाणु – जीवाणु से मुक्त हो ।आज के समय में नदियां सबसे ज्यादा प्रदूषित है क्योंकि नदियों में कारखानों ,खेतों , उद्योगों,का जहरीला पानी गंदे नालों से छोड़ा जा रहा है ।यह तो प्रदूषण के हालात हैं ही साथ ही सामाजिक आयोजनों में इस्तेमाल होने वाली डिस्पोजल सामग्री भी नदियों की धाराओं में बहाई जा रही है ।जब नदियों में बाढ़ आती है तो यही सामग्री बाढ़ के पानी पर तैरती मिलती है ।नालियों और गटरों में भी ये अड़ कर उनके बहाव को रोकती है ।क्या समाज इसका कोई परिपाटी से चला आता तरीका मतलब समाज की जाति पंचायतें जिस तरह समाज के उपयोग के लिए समाज की धर्मशालाओं ,अध्यक्ष के निवास के कमरों में पकाने और खाने के बर्तन की व्यवस्था करती थी क्या अब भी ऐसी पंचायती व्यवस्था और प्रबंध नहीं किए जा सकते ? इस प्रबंध से एक बहुत बड़ा प्रदूषण ,कचरा और गंदगी से समाज को बचाया जा सकता है ,नदियों की स्वच्छता और निर्मलता बनाई जा सकती है । मिट्टी का लेप करना भी यह उपचार की एक प्राकृतिक विधि है जिसमें रोग ,ताप, कम करने के लिए मिट्टी का लेप किया जाता है ।आज नदियों से रेत का मनमाना खनन किया जा रहा है और जनता पानी के अभाव का संकट झेल रही है ऐसी स्थिति में नदियों पर गांव की प्रदूषण हीन मिट्टी का लेपन किया जाये तब ही वे प्रदूषण मुक्त होंगी ।पर जन मानस इस के लिए जागरुक हैं ? फिर खेतों से बाढ़ के समय जो मिट्टी बहकर नदियों में जाती भी है तो वह रासायनिक कीट नाशक,रासायनिक खाद ,आदि जहरीले रसायनों से युक्त होती है । नदियां इस तरह की मिट्टी से रोग ग्रस्त ही होती है ? इसीलिए तो नदियों को कुएं के मीठे पानी से आजाद स्नान याने सड़ाने की बात हो रही है ।यह सपड़ाना शब्द देशज भाव लिए है ।यह सपड़ाना याने स्नान,नहाने के सिर से पांव तक रगड़ रगड़ कर मैल छुड़ाने की क्रिया है । मन करता पहाड़ों ,पठारों, मैदानों पर बिखरे कचरे को खजूर की झाड़ू से बुहार दूं ।याने खुतर – खुतर कर बुहारना रंच मात्र भी कचरा ,गंदगी, प्रदूषण कहीं कोने – कोचरे में न रहे ।बुहारने की यह क्रिया सब दूर एक साथ होनी चाहिए ।मन करता आदमी के अन्दर जाकर या मानसिक, वैचारिक प्रदूषण भी साफ करने के लिए जो द्वेष के भाव है ,जो नफरत के भाव है ,जो हिंसा के विचार है उनकी सफाई,जो छल ,कपट ,धोखा,, जालसाजी है उन सब को साफ करने के लिए रक्त की एक एक बूंद को शुध्द करने की इच्छा कितनी पावन इच्छा है ।जो आदमी में वैचारिक और मानसिक प्रदूषण स्वार्थ,लालच, क्रोध, उपेक्षा, अपमान , भ्रष्टाचार के रुप में बढ़ा है उस सबकी जगह प्रेम ,भाईचारा, नैतिकता, अहिंसा ,करुणा , संवेदना के रक्त संचार बढ़े ।यह आदमी का निर्मल , पवित्र, और आत्मस्थ रुप है ।इसी रुप में आदमी के अन्दर के वैचारिक ,मानसिक प्रदूषण को साफ करने की चाह होना मनुष्यता है ।आदमी का तनाव ,आदमी के भीतर तैरती घृणा के भाव ईर्ष्या के भाव आदमी की गिरावट के ही प्रमाण हैं ।मन तो यह भी करता है कि ब्रह्माण्ड में जो आदमी ने तरक्की के नाम पर उपग्रह, सेटेलाइट, आदि भेजकर आकाश को भी निरापद नहीं रहने दिया ।उस सौर मंडल के ग्रहों – नक्षत्रों पर जो गर्द याने महिने सी धूल ,रज कण जा पहुंचे हैं और वे उन्हें प्रदूषित कर रहे हैं उनके भू मंडल के परिभ्रमण में रुकावट पैदा कर रहे हैं उनको भी झटकार दिया जाये ।पर यह सफाई की स्वच्छता की पूरी क्रिया अकेले संभव नहीं है इसलिए सबका साथ चल पड़ना बेहद जरुरी है ।विचार स्पष्ट है कि नदियों को ,धरती को ,आदमी को ग्रहों और नक्षत्रों को साफ करने की यह इच्छा समाज के हर व्यक्ति के भीतर उत्कट हो ? सब प्रदूषण के ख़तरों को समान रूप से बुध्दि, चेतना, संवेदना ,करुणा के सभी स्तरों पर समान रुप से महसूस करें ।सब इसके लिए तत्पर हों ।सभी को समाज में व्याप्त अनैतिक स्थितियां विचलित करे ।सभी को नदियों का प्रदूषण अखरे , पेय जल का संकट और स्वच्छ केमिकल शून्य पानी की उपलब्धता के प्रति सभी नागरिक और मनुष्य सचेत ,सतर्क और दृढ़ संकल्पित हों तब ही तो समाज , नदियां, सौर मंडल ,पृथ्वी प्रदूषण मुक्त होंगी । समाज की सहमति और जागरुकता के बिना न तो नैतिकता आ सकती है न आदमी का भ्रष्ट आचरण ही सुधर सकता है ।इन सबके लिए आत्म अनुशासन बेहद जरुरी है ।आत्म ज्ञान ही वह संयम है जहां से आदमी के भीतर प्रदूषण मिटाने की चाह जन्म लेती है ।यह उस ऊब का भी प्रमाण है जहां मानसिक विकृतियों ,हिंसा की वृत्तियों ,छल – कपट के व्यवहारों , नैतिकता शून्य वातावरण से मुक्त संतुलन बनाने का संताप मन पर बोझ बना हुआ है ।इस अप्रत्यक्ष बोझ से मुक्ति की चेतना जागना भी सामाजिक संवेदना की प्रतीति है ।यह गहरी अनुभूति का अहसास है । वैचारिक शुध्दि ही रक्त संचार का अबाध स्पन्दन है ।यही खून का साफ होने की प्रक्रिया है ।
विनीता रघुवंशी
