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विनीता रघुवंशी
अपने -अपने ठांव
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पांव में लिपटी नदी
चली आई मेरे साथ शहर
चली आई खेतों की महक
आंगन की जोति
चौखट की बंदनवार मेरे साथ
जो देखना चाहते महानगर
जबकि किराए का इकलौता कमरा
मुझे ही नहीं रख पाता ठीक से
ऐसे में कहां बिठाऊ इन्हें
और किस छोर से दिखाऊं शहर
कि जहां पानी को तरसते लोगों को
नलों पर देख सूख न जाये नदी
गटरों की बदबू से
मूर्च्छित न हो जाए खेतों की महक
स्टिकर गिर न पड़े
सड़कों के दशकों से आंगन की जोति
और टूटकर कुचल न जाए
चौखट की बंदनवार भीड़ में
इसके पहले की पड़ोसी कुछ पूछे
मुझे फिर से लौटना होगा गांव
ताकि छोड़ सकूं इन्हें अपने – अपने ठांव ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ——“ नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में शहर के भौतिक संसाधनों ,सुख – सुविधा और आकर्षण इतने ज्यादा परिजनों में उत्सुकता पैदा कर देते हैं कि जब परिवार का सदस्य भाई ,पिता या पति शहर में आजीविका के लिए आता है तो बहन,बेटी,पत्नी सबको शहर के सिनेमा ,फैशन , वस्तुओं की खरीद आदि की लालसा बढ़ जाती है । यहां बंदनवार बहन का प्रतीक है जोति बेटी का और नदी और महक पत्नी और मां के प्रतीक रुप में प्रयुक्त है ।ये सब परिजन है जिनके मन में शहर के प्रति आकर्षण और मोह है । लेकिन जो घर का सदस्य घर छोड़कर शहर आया है उसकी खुद की स्थिति बहुत सुखमय नहीं है ।उसके सामने शहर की बदहाली और बहुत सारे बदहाली के दृश्य हैं जिनका सामना रोज ब रोज उसे करना पड़ते हैं ।गांव की तरह उसके पास रहने को बहुत बड़ा घर नहीं है जहां सभी परिजन समा सकें।फिर नलों में पानी नहीं बस हवा आती है ।नदी याने मां जिसका स्नेह अनवरत धारा बना बहता है वह सूख न जाये शहर की तकलीफों को देखकर ,खेतों की महक शहर की दुर्गंध से मूर्च्छित न हो जाये ।शहर और गांव के जीवन में कितना अन्तर है । सड़कें हैं तो वहां बड़े बड़े गढ्डे हैं ,दचके हैं जिनमें बेटी को चलने की आदत नहीं तो कहीं साफ- सुथरे आंगन में चलने – फिरने वाली जोति फिसल न जाए । दूसरी ओर बहन की चिन्ता और फिक्र से मन व्याकुल है कि शहर की भीड़ में बहन कुचल न जाए इन सब परिजनों को शहर की तकलीफों को सहने की आदत नहीं है । परिजनों को सम्हालना शहर में एक बड़ी चुनौती की वजह है ।आजकल शहर दूर के ढोल सुहावने की तरह है जब इनके भीतर जीवन गुजारना पड़ता है तो इनकी करकशता का अहसास होता है ।दूर से शहर की चकाचौंध ,चमक दमक बहुत ही आकर्षक लगती है लेकिन कदम कदम पर जब पीड़ा ,अकेलापन ,अजनबीपन ,धन की तंगी ,और छोटी से छोटी इच्छा,कामना ,चाह ,भूख, अन्न,स्वाद , प्यास के दाम चुकाने पड़ते हैं तब शहर से बड़ा कोई यातना का मुकाम नहीं होता । यह सब शहर का ही दृश्य है । जहां आदमी की पहचान मिट जाती है और रुपया की पहचान या जेब से आदमी की पहचान बनती बिगड़ती है ।शहर है जहां आदमी अपने पांव पेट में घुसाकर जीता है ।यह हकीकत है शहर की और आज की स्थिति में शहर तो और भी भयावह दौर से गुजर रहे हैं ।शहर का फैलाव जिस गति से हो रहा है कि साफ सफाई की व्यवस्था चरमरा रही है ।दूध – पानी ,छाछ तक बेची जा रही है ।शहर के आते जाते रास्तों पर कचरे के ढेर और उनसे उठती दुर्गंध ,बदबू आदमी को पस्त किये दे रहे हैं ।कोई ठीक व्यवस्था या इंतजाम ही नहीं ।परिजनों के बहाने कविता ने शहरों की दुर्दशा का हाल बयान कर दिया है ।शहर में परिजनों को लाकर उनको बीमार या रोग ग्रस्त करने से तो अच्छा है वे गांव में अपने – अपने घरों में सुरक्षित और निरोगी रहे ।गांवों में अभी भी स्वच्छता के प्रति चेतना है लेकिन शहर में बसी आबादी चारों तरफ से आ आकर बस्ती है इसलिए वहां एक समान पहचान या परिचय का कोई सूत्र नहीं जुड़ता ।सभी परस्पर एक – दूसरे के लिए अजनबी होते हैं इसलिए इस अपरिचय के कारणों से भी अव्यवस्था जैसी की तैसी बनी रहती है । शहरों पर निजीकरण और ठेकेदारी की प्रथा भी दुष्प्रभाव बढ़ाती है ।शहर कालोनियों ,नगरों , उपनगरों में बंटा होता है इस कारण भी व्यवस्था दुरावस्था में बदल जाती है । आदमी शहर में रहे या गांव में यदि स्वच्छ और सफाई की आदत होगी तो वह उस चेतना से अवश्य वाकिफ रहता है कि घर की गंदगी निकाल कर चौंक – चौराहों पर न डाले ।आज का व्यक्ति इतना ज्यादा लापरवाह और चेतना शून्य हो चुका है कि वह पर्यावरण पर खूब बोलता है लेकिन चिन्ता नहीं करता ।शहर के प्रति आत्मीयता और लगाव भी व्यवहार में नहीं झलकता है ।शहर गांव नगर की स्वच्छता हर नगर वासी और शहर वासी गांव वासी की चिन्ता और चेतना में शामिल होना चाहिए ।तब ही शहर सचमुच आकर्षण के विषय होंगे वरना शहर की गंदगी बदबू को दिखाने से शहर का गर्व और गरिमा कभी भी नहीं बढ़ेगी । अपने शहर ,अपनी नदी ,अपनी कालोनी हर हमेशा देखने और दिखाने के लायक बनी रहे ।यही हमारा गौरव और गरिमा है । यहीं से हमारे मनुष्य बनने की शिक्षा और सबक दोनों दिखलाई पड़ते हैं ।
