11
विनीता रघुवंशी
मां की आंखों में
**************
कितनी भी दूर रहे मां
हमें आंखों में समाए रहती
और उन्हें भी
जो अधसिले झंगें – टोपी छोड़
जन्म के साथ ही मर गए
खेल खिलौने मैदान
सभी बसें हैं
और हमारी मनौती को
नदी में छोड़े
आटे के असंख्य दिये भी
कुछ भी तो खाली नहीं हुआ
मां की आंखों से
सब कुछ तैर रहा धार – धार
इतनी दूर रहकर
जब भी —-
मां के बारे में सोचते
नेहभरी एक बदली हमारे अन्दर
झमाझम बरसने लगती है ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ——“ नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में ममत्व की भावानुभूति की गहराई और मां के मर्मस्पर्शी संबंध को महसूस किया गया है ।संसार के समस्त संबंध में कुछ न कुछ खुदगर्जी ,स्वार्थ का तत्व समाया रहता है लेकिन मां ही ऐसा संबंध है जो इस तरह की लकीरों से आयत नहीं होता ।याने इस संबंध के सभी कोण ,सभी पहलू निस्वार्थ भाव से परिपूर्ण होते हैं ।यह एकमात्र संबंध है जिस पर दुनिया की सभी दौलत ,सभी वैभव ,सभी आराम और सुख न्यौछावर किये जा सकते हैं ।यह संबंध निरापद होता है ।पुत्र कुपुत्र हो सकता है मगर माता कभी कुमाता नहीं हो सकती ? संतान मां से चाहे कितनी ही दूर रहें लेकिन वह हर हमेशा अपने बच्चों के प्रति चिन्ता और सदय ही दिखाई देगी ।पत्नी हमेशा पति को” लाता ” हुआ देखना चाहती है लेकिन माता हमेशा पुत्र को “आता ” देखना चाहती है ।उसे संतान की कमाई ,धन आदि से वह सरोकार नहीं होते जो उसके अपने आसपास होने से होते हैं ।मां की नजरों में हमेशा संतान की भलाई ,कल्याण ,और समृध्दि की फिक्र समाई रहती है ।मां की आंखें हर बार प्रेम से ,लगाव से भींगी रहेगी ।वह उन अजन्मे और असमय मृत्यु को प्राप्त हुई संतानों के प्रति भी संताप और वेदना – व्यथा की अनुभूति से उसकी स्मृतियां भरी रहेगी ।वह अपनी संतान को कभी भी विस्मृत नहीं करती यही तो खूबी है मां की ममता में ? इसीलिए मां मां होती है वह जगत जननी होती है ।मां का समर्पण केवल मनुष्य योनि में ही नहीं होता ।यह तो प्राणीमात्र की माता का स्वरुप समर्पण में ही निहित होता है ।जिस तरह मनुष्य का लालन – पालन मां करती है वैसे ही प्राणीमात्र और जीव मात्र की माता अपनी संतानों को अपनी आंखों में बसाये रहती है यदि ऐसा नहीं होता तो धरती पर जीवन मात्र का अस्तित्व हर समय संकट ग्रस्त ही रहता ? जीव विविधता के फिर प्रमाण ही नहीं मिलते । यह सृष्टि का सृजन भाव है ।सृष्टि में मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी या जीव है जो बुध्दि ,चेतना ,और विवेक का धनी है । आदमी का जीवन पालन – पोषण जिस चिन्ता और संवेदना से मां के द्वारा किया जाता है वैसा सब प्राणियों में भी किया जाता है । लेकिन मनुष्य चेतना और विचार और संवेदना का मर्मज्ञ है इसलिए मां का स्नेह महसूस कर सकता है ।मां भी अपनी हर संतान के प्रति ममता से भरी होती है ।वह संतान के आने से पहले से ही मन्नत और मनौती करती है उसके स्वास्थ्य की वृध्दि की कुशलता की संभवतः वह मां की ही कल्पना रही होगी जिसकी मनौतियों ने ईश्वर के रुप की जगत में पहचान
कराई ।वह मां की ही चिन्ता होगी जिसने प्रार्थना और दुआ के शब्द रचे । वह मां का प्यार ही होगा जिसने ईश्वर को भी मनुष्य बनने के विवश किया ।सचमुच मां चाहे हम से कोसों दूर रहें लेकिन उसकी आंखों में ,बातों में अपनी संतानों के प्रति लगाव भरा रहता है ।स्मृतियों में भी संतान ही हमेशा आंखों में समाई रहती है ।मां की आंखें स्नेह से ,चिन्ता से ,फिक्र से खुशी से हर समय डबडबाई रहती है ।मां की आंखों में अपनी संतानों की उनहार ( छवि ) बसी रहती है । संतान चाहे कितनी ही उम्र दराज हो जाये मां की ममता भरी आंखों में वह बच्चा ही होती है । मां के अन्तर आत्मा का लगाव कभी भी कम नहीं होता यह तो बढ़ता ही रहता है ।मां की आंखें हमेशा संतान पर निगाह जमाए रहती है भले नजरों की बिनाई मंद हो जाये । मां की आंखें हर समय सजग और सचेत रहती है ।
