Home आज की कविताशहर आते ही-नर्मदा की लहरों से

शहर आते ही-नर्मदा की लहरों से

by Dr. Vinita Raghuvanshi
शहर आते ही
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शहर आते ही
किराए की खोली में
जतन से रख लेता अपना गांव
और सहेजता रहता
काम पर जाते – – आते हर रोज उसे
ये शहर जब जब
जहरीली हवाएं उड़ेलता
तब- तब सीने से सटाए
मुझमें जीने की ताकत
भरता है मेरा गांव ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह ——“ नर्मदा की लहरों से ” से उद्धृत )
आज की कविता में गांव याने घर – परिवार के लगाव और प्यार का आत्मबल ही जीने का भरोसा देता है ।जिसके पास यह आत्मीयता नहीं उसके भीतर जीने की ललक भी नहीं ।शहर हर समस्या का निदान और समाधान समझा जाता है ।शहर में तकनीकि उन्नति है सभी तरह की भौतिक सुख – सुविधाएं हैं ।आवागमन के साधन है और भूख – बेकारी के सवालों के हल हैं ।यह माना जाता है । इसीलिए गांव छोड़कर आदमी शहर में आजीविका उपार्जन के लिए आता है लेकिन फिर भी उसके दिल में ,दिमाग में अपना गांव ,अपने परिजन ,अपने नाते – रिश्ते ,अपनी गली और मोहल्ला – पड़ोस सब बसा रहता है ।गांव से पलायन तो बस वह अकेला करता है लेकिन गांव की स्मृतियां और प्यार वह अपने में सहेजता रहता है । गांव कभी भी मन से दूर नहीं होता । स्मृतियों में बसा कोई न कोई गाहे ब गाहे हृदय के द्वार पर दस्तक दे ही देता है ।यह सहेजना बहुत ही महत्वपूर्ण होता है ।इस सहेजने में मन के भीतर का अकेलापन हर हमेशा दूर रहता है ।यह तनाव को कम करता है ।यह मन के कोनों को अलगाव और द्वेष के अन्धकार से बचाता है ।एक आत्मतुष्टी रहती है ।कविता की यह पंक्ति दृष्टव्य है —” ये शहर जब जब /
जहरीली हवाएं उड़ेलता ” का मतलब है एक दंगें और फसाद जब भी फैलाए जाते हैं या कारखानों ,उद्योग ,धंधों में जब भी कोई केमिकल या रसायन का रिसाव होता है तब तब शहर में बसे आदमी पर ,प्राणियों पर जीवन के लाले पड़ जाते हैं ।ऐसे ही वक्त में जीवन बचाने का जो बल गांव का प्यार है ।गांव की स्मृतियां हैं वे ही जीवन बचाये रखने की ललक पैदा करती है ।गांव में भले रोजगार की स्थितियां नहीं बची लेकिन अब भी गांव में पहचान ,परिचय ,लगाव ,प्यार शेष है ।यह क्या शहर से कम महत्वपूर्ण है। इसीलिए जब गांव छोड़ा जाता है तब भी सीने में थोड़ा सा गांव धड़कता रहता है । वहां की रवायतें , वहां का लोक आचरण , वहां की ठिठोली और उपहास की अन्तरंगता दिल में समाई रहती है ।वे बचपन के साथी हृदय में आबाद रहते हैं ।वे गलियां और खेत – खलिहान ,वे जुवार के पोखरे ( भुट्टे) मकई के भुंजे दानों का स्वाद हो या खेत की मेड़ पर उगते आम की मिठास हो सब शहर की किराये की खोली में जतन से रखी जा सकती है ।मां की मनुहार और पिता का दुलार हो , भाई बहन का झगड़ना हो या यारी में ली झूले की पींगें हो ।क्या क्या स्मृतियों में सहेजा जाये ।यह सब तब और भी महत्ता वाला हो जाता है जब शहर की नीरसता , उबाऊ जीवन शैली हो , और हवाओं में जीवन नाशक जहर की हवाएं बहरी हो तब तब जीवन को सम्बल देता गांव हमारे अन्दर हिलोरें लेता है ।तब तब गांव की बातें ,गांव का जीवन ,गांव का प्यार सब बेहद मूल्यवान हो जाता है । अब तो बहुत से परिवार शहर छोड़कर गांव के स्वच्छ पर्यावरण की ओर लौट रहे हैं यह आधुनिक परिवेश के लिए शुभ संकेत है बस जरुरत है अनौपचारिक लोक व्यवहार और भौतिक चेतना के बदलाव के साथ यह हो । शहर संभावना है रोजगार के लिए लेकिन गांव अब भी संभावना है जीवन दायक स्थितियों के लिए ।
🙏विनीता रघुवंशी

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