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सांस्कृतिक हमला *************** आप चाहते हैं कि आपके मकान में चारों तरफ से हवा ,प्रकाश आते रहें तो मेहरबानी करके घर के आसपास प्राचीरे मत उठाइये खोले रखिए घर की …

गर्भगृह तक *********** हवा ने पेड़ों के कान में कुछ सुरसुराया और बजने लगे कछार और जोर थिरकने लगी नदी और फिसल चले लहरों के रुमाल हिलाते प्रपात कोसों दूर …

छोटी जगह ********** वैसे लिखने के लिए छोटी जगह ही चाहिए लेकिन बड़ा कठिन होता छोटी जगह में लिखना जहां न तो बालक होते न प्रेरक ,न सलाहकार होते हैं …

आलिंगन ********* गुनगुनी धूप ने छुआ तो पिघलता रहा देर तक और वह भी आहिस्ता आहिस्ता हमारी रही मुझमें एक दूजे की गंध में डूबी पसीना पसीना होती रही देह …

कहीं न कहीं *********** सड़कें सड़कों से छेड़छाड़ करती आड़ी तिरछी बलखाती राजमार्गों से जुड़ जातीं कहीं न कहीं पटरियां पटरियों से सन्नाती बोलती – बतियाती थर्राते हुए जंक्शनों से …

एक साथ ********* मैंने लिखनी चाही कविता उसी क्षण गोल में आ बैठी नन्हीं बिटिया कविता लिखने के क्षण वात्सल्य से भरे होते हैं कविता लिखते लिखते बेटी सयानी होगी …

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