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गर्भगृह तक – पकी फसल के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
गर्भगृह तक
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हवा ने पेड़ों के कान में कुछ सुरसुराया
और बजने लगे कछार
और जोर थिरकने लगी नदी
और फिसल चले लहरों के रुमाल हिलाते प्रपात
कोसों दूर से प्रिया – पुकार सुन
पल्लर पल्लर झूम उठा सागर
तभी धूप- दीप से महकते बादल आये
और लाद चले भाप – भाप उसे
राम लीं मशालें बिजलियों ने
और घरघराती चल पड़ीं गए यात्रा आकाश से
आजकल इनकी ही पहुनाई में लगी धरती
पानी पानी है गर्भगृह तक !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-“ पकी फसल के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता में कल्पना ,प्रकृति , और स्त्री के मनोभावों का एक साथ चित्रण किया गया है ।प्रकृति सुरम्य होती है आषाढ़ आने पर।हवा में नमी आती है बरसात में ।बरसात में आई नम हवाये प्रकृति को प्रेम के लिए प्रेरित कर रही है । –“हवा ने पेड़ों के कान में कुछ सुरसुराया ” यह कुछ सुरसुराना क्या है ? यह है प्रेम की उन्मत्त अवस्था ! कछारों में मौसम के नगाड़े बजने लगे याने आषाढ़ की मेघ गर्जना होने लगी ।नदी में भी थिरकन पैदा हो गई ।याने नदी के उफान का समय आ गया ।बरसात से बाढ़ आने वाली है ।यह प्रकृति चित्रण भी है और श्रृंगार का रस परिपाक भी है । प्रपातों की लहरों की फिसलन में रुमाल हिलाने की इशारे कितने मनोहारी कल्पना है ।याने ये प्रपातों का बहना नहीं वरन अपनी प्रिया को धैर्य बंधाने वाला संकेत है जो मिलन के इशारों से भरा है ।खूब सुन्दर प्रकृति चित्रण और प्रेम की श्रृंगार भरी स्वीकृति का मनमोहक दृश्य ।सागर का पल्लर पल्लर झूम उठना । बादलों में भरी वर्षा से उठती माटी की सौंधी गंध का फैल जाना । बादलों की महक ? मिट्टी की सौंधी गंध की महक से महकता वातावरण । यह सब तो बरसात के आगमन का असर है ।यह महसूस करना ही कितना मादक और उत्तेजक है । बादलों का सागर से भाप उठाना कितना मोहक दृश्य है । यह कविता नहीं वर्षा ऋतु का एक स्केच सी लगती है । बादल भाप को लाल कर चल रहे हैं तो बिजलियां चमक- चमक कर मशालों का काम कर रही हैं । इस तरह धरती पर बादल रुपी गज अपनी यात्रा लेकर आकाश से चल पड़ें हैं और धरती इनकी मेजवानी में गर्भ तक पानी पानी है ।याने धरती में सरसता आ गई है ।अब वह सृजन उत्सुक हैं । वर्षा के आगमन का यह दृश्य अद्भुत और अनूठा है ।बरसात तो हर वर्ष आती है लेकिन इस तरह की उद्भावना उसे बहुत ही खास बना जाती है । यह रोमांच करी कल्पना ऋतु के अहसास को अनोखा ही नहीं बनाती वरन एक नई उमंग से भी मन को भर देती है ।वर्षा है तो उत्साह के नवीन अनूठे आनंद भी हैं ।यह ऋतु उत्सवों के भी नये रोमांच और रोमांस के चित्र रचती है । प्रकृति और श्रृंगार के दोहरे दृश्य कविता को रचती यह उद्भावना काव्य सौन्दर्य का अद्भुत नमूना है । 🙏 विनीता रघुवंशी

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