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विनीता रघुवंशी
छोटी जगह
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वैसे लिखने के लिए
छोटी जगह ही चाहिए
लेकिन बड़ा कठिन होता
छोटी जगह में लिखना
जहां न तो बालक होते
न प्रेरक ,न सलाहकार
होते हैं तो सिर्फ
ईर्ष्या से किटकिटाते बन्धु
कितना कितना कठिन होता है
छोटी जगह में लिखना
जबकि लिखने के लिए
छोटी जगह ही चाहिए ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” पकी फसल के बीच ” से उद्धृत)
आबादी की दृष्टि से छोटी जगह ,कस्बा ,गांव ,शहर नगर महानगर राजधानी कोई भी आबाद बस्ती ।बसाहट यही मायने तो हैं बड़ी जगह और छोटी जगह के । छोटे कस्बे में रहकर लेखन कर्म करना बड़ा ही दुष्कर होता है । वहां न तो पाठक वर्ग होता है न श्रोता वर्ग ही होता है ।न सहृदय अर्थात साहित्य का बोध रखने वाला ही होता है ।न कविता के मर्म को हृदयंगम करने वाला ही कोई एकाध प्रशंसक ही होता है ।न शब्द,अर्थ और व्यंजना की प्रयुक्ति पर मशविरा देने वाला व्याकरण विद ही होता है ।छोटी जगह ,छोटी आबादी में यदि कोई होते हैं तो ईर्ष्यालु होते हैं ।जो संवेदनशील लेखक की निन्दा करके उसकी जड़ खोदते रहते हैं ।इस तरह के रुखे – सूखे माहौल में संवेदना की नमी वाला लेखन करना बेहद कठिन होता है ।एक लेखक को लिखने की प्रेरणा देने वाला बालक याने सहृदय व्यक्ति तो मिलना ही चाहिए जो समय समय पर रचना को लेकर ,उसकी गहराई भरे मर्म और चेतना को सामाजिक चिन्ता और यथार्थ पर समीचीन वैचारिक तथ्य प्रकट कर सके ।यह है छोटी जगह में रचना या साहित्य सृजन की परेशानी । छोटी जगह याने स्पेस ।लिखने के लिए चुना गया स्थान ,आसंदी आदि ।यह मायने होते हुए भी यह एक वैचारिक विमर्श ही है कि कस्बे में रहकर लिखने का यह भी मायना है कि लेखन का सर्वव्यापक प्रचार -प्रसार न हो पाना । समाज के बहुत बड़े तबके तक लेख ,या साहित्य का असर उन मूल्यांकन कर्ताओं तक या समीक्षकों तक न पहुंच पाना ,उन अकादमियों और साहित्य संस्थानों तक न पहुंच पाना या उन पुरस्कार प्रदाता एजेंसियों तक न पहुंच पाना जहां साहित्य के पारखी बन — “अंधा बांटे रेवड़ी चीन – चीन के देय ” की मिसाल के प्रमाण बिखरे पड़े हों । जहां पुरस्कार के मैदान बड़ी जगहों में रहने वाले लेखकों को ही मिल जाते हों तब यह बात रेखांकित की जाती है कि यदि पारखियों की नजर में आना है तो बड़ी जगह में रहकर लेखन कर्म किया जाना चाहिए ।यह है छोटी जगह और बड़ी जगह पर रहकर लेखन कर्म करने के मायने ? लेखन में गुणवत्ता होना चाहिए वह फिर छोटी जगह में रहकर लिखा जाये या बड़ी जगह में ? सामाजिक सत्य का दृढ़ता से खुलासा करना उस पर अपनी वैचारिक दृष्टि का मत स्थिर करना यही तो लेखन की जिम्मेदारी और दायित्व है ।एक सच्चा लेखक जब अपने समाज की चिन्ता कर रहा होता है ।जब वह समाज के अन्याय पर निगाह डाल रहा होता है या गैर बराबरी पर ध्यान दें रहा होता है तब वह छोटी जगह में रहकर भी समाज को जागृत कर रहा होता है ।उसकी होजरी होती संवेदना को धार देता है ।उसे विचार करने के लिए प्रेरित करता है ।छोटी जगहों पर ही अज्ञान ,अंधविश्वास , कुरीतियां बहुत ज्यादा पनपती है । इसलिए लेखक को छोटी जगह पर रहकर ही लेखन कर्म करना चाहिए ।चेतना वान। लेखक। को लिखने के लिए बहुत छोटी जगह याने छोटा – सा स्पेस ही चाहिए । बदलाव के लिए एक छोटा विचार तन्तु ही बहुत बड़ा बदलाव कर सकता है । लेखक जगह के फैलाव से नहीं चेतना के फैलाव के कारण लिखता है इसीलिए जगह चाहे छोटी सी क्यों न हो वह विचार को पूरे विश्व तक पहुंचा सकता है ।छोटी जगह में ही गुणवत्ता वाला लेखन किया जा सकता है ।मायने विचार के होते हैं वृत्तियों की संकीर्णताओं के नहीं ।
