Home आज की कविताआलिंगन-पकी फसल के बीच

आलिंगन-पकी फसल के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
आलिंगन
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गुनगुनी धूप ने
छुआ
तो पिघलता रहा
देर तक
और वह भी
आहिस्ता आहिस्ता
हमारी रही मुझमें
एक दूजे की
गंध में डूबी
पसीना पसीना
होती रही देह
और मिटती रही
निस्संदेह
आत्मा से
आत्मा की दूरियां ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” पकी फसल के बीच ” से उद्धृत )
आज की यह लघु रुप कविता एक भावपूर्ण अहसास लिए हुए है ।गुनगुनी धूप की ऊष्मा से तृप्त होता मन ।प्रकृति ही वह सामर्थ्य रखती है जिसे महसूस करके आत्मा के सोए रन्ध्र खिल जाते हैं ।नैसर्गिक प्रेम का आनंद ही सच्चा आनंद और रस है । गुनगुनी धूप की छुअन ही वह छुअन है जो मन मीत की स्मृति -द्वार पर दस्तक बन प्रेम का आंगन खोल देती है । आज हम जिस तरह के कृत्रिम जीवन को जी रहे हैं वहां आत्मा के पास अहसास का कोई भंडार बचा ही नहीं है ।हम सब एक सतही और स्तर हीन जीवन चक्र को केवल अपनी सांसों से भरकर पूरा करते हैं ।आत्मा के स्तर तक तो आज के मनुष्य की भाव भूमि और अनुभूति का स्तर पहुंच ही नहीं पाता ।आत्मा के सिरे को पकड़ कर जीवन व्यतीत करने में आज के मनुष्य का भरोसा खतम हो चुका है ।आज कर्म और सुकर्म की बारीक सी लकीर मिट गई है ।सभी कर्म अपकर्म की सीमा से बाहर हो गये हैं ।अमानवीय आचरण और मक्कारी भरा ढोंग जीवन की सार्थक शैली है ।आत्मा की जागृति पर उसकी अनुभूति का अनुभव के क्षण का अभाव हमारे चारों ओर फैला हुआ है ।आज के समय में आत्मा ,परमात्मा ,पाप – पुण्य ,स्वर्ग – नर्क की बात पुरानी और पुराण पंथी हो चुकी है । जब हमारी धारणाएं आत्मा को केन्द्र में रखकर जीवन पर विचार विमर्श करती थी तो हमारा समाज पर्यावरण ,जगत के स्वच्छ और कल्याण मय होने तथा परिवेश में जीवन संवर्द्धन के सुकर्म किये जाते थे ।प्राकृतिक दोहन के प्रति इस प्रकार की प्रवृत्ति नहीं होती थी ।मानव जीवन को सुन्दर और कल्याण से युक्त सत्य से जोड़ा जाता है ।आज जीवन है पर विचार पूर्ण मानव हित से दूर है ।अन्वी दौड़ है ।अमानवीय इच्छाएं हैं ।ज्ञानवाणी व्यवस्था का संस्थापक बना मनुष्य अपनी अस्मिता की जड़ खोद रहा है ।सामाजिक भाव और चेतना का अभाव समग्र जीवन शैली का हिस्सा है ।विचार विहीन जीवन शैली जीता मनुष्य केवल पुतला बना सब सहने का भागीदार है ।आत्मा से आत्मा के मिलन की अनुभूति से बेखबर ।
प्रकृति ही वह भूल गया है ।गुनगुनी धूप का गुनगुना स्पर्श ही महसूस नहीं होता ।पसीने की आदिम गंध बिसरा चुका है ।यह सब मानवीय चेतना के प्रमाण है ।आज वर्तमान में आदमी अपनी महसूस करने की क्षमता को ही भूल चुका है ।यही विडम्बना है ?
🙏 विनीता रघुवंशी

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