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कहीं न कहीं
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सड़कें सड़कों से छेड़छाड़ करती
आड़ी तिरछी बलखाती
राजमार्गों से जुड़ जातीं कहीं न कहीं
पटरियां पटरियों से सन्नाती
बोलती – बतियाती थर्राते हुए
जंक्शनों से जुड़ जातीं कहीं न कहीं
आकाश ,आकाशों से सर्च लाइट के
संकेतों की प्रतीक्षा में तैनात सैर सपाटों को
हवाई अड्डों पर चढ़ते उतरते कहीं न कहीं
हमें भी अपने पांवों के नीचे
पुख्ता करनी है
सत्य – संज्ञान की जमीन कहीं न कहीं ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- “ पकी फसल के बीच ” से उद्धृत )
मार्ग कहीं नहीं जाते मार्गों पर चलते हुए ,सफर करते हुए आदमी पहुंच जाता है अपने गंतव्य पर । हर समय ,हर काल में ,हर युग में मनुष्य की इच्छा और आकांक्षा रही है कि वह यात्रा करें ,सफर पर निकले ,उसका कोई न कोई गंतव्य हो ।वह हमेशा गतिवान रहे ।यात्रा और सफ़र ही वह सिलसिला है जिससे आदमी गतिशील और गति वान बना रहता है ।वह जब घर से बाहर निकलता है और चौंक – चौराहों पर आता है तो ही उसके मन को चलते रहने की प्रेरणा मिलती है ।वह हर समय उन सड़कों की खोज करता रहता है जो उसके यात्रित मन को संतुष्ट करे। नगरों , महानगरों,शहरों , कस्बों ,और गांवों में मनुष्य के पैदल चलने के लिए रास्तों का निर्माण किया जाता है सफर के कई तरीके मनुष्य ने ईजाद कर लिये हैं । पहले मनुष्य केवल समुद्र या जलीय मार्ग और स्थल मार्ग से ही सफर करता था लेकिन अब मनुष्य ने हवाई यात्रा के। माध्यम से भी यात्रा के मार्ग खोज लिए ।यह सफर की चाह आदमी को निरंतर मार्ग बदलने की सुविधा और साधन देती रहती है । सड़कें सड़कों से मिलकर राजमार्ग तक जुड़ जातीं हैं ।यह एक संकेत है । सत्ता तक पहुंचने का मार्ग बड़ा बल खाता हुआ है ।आदमी को अपनी सत्ता तक पहुंचने की यात्रा में बहुत सारे लोग, बहुत सारे हथकण्डे, बहुत सारे करिश्में , बहुत सी चाटुकारी , बहुत सी चापलूसी अपनानी पड़ती है । लेकिन इस तरह सत्ता तक पहुंची यात्रा स्थाई सम्मान , गैरत ,जमीर , और जमीन के खोखलेपन के अलावा कुछ नहीं देती ।बस आदमी सत्ता के निर्जीव पंखों के जरिए उड़ान भरता है और कहीं न कहीं उतर जाता है ।जनता इस तरह दोयम दर्जे के सत्ता प्रमुखों के सत्य से परिचित होती है ।उनके आचरण की भ्रष्टता उन्हें गहराई से प्रभावित नहीं करती ? वे सत्ता तक पहुंचने की यात्रा अवश्य करते हैं और ब जरिए ऊंचाई तक पहुंच भी जाते हैं लेकिन जनता के मन में कोई गहरा ,कोई प्रतिष्ठित स्थान या छवि नहीं गढ़ पाते ? यह विचारणीय तथ्य है ।सत्ता की हर ऊंचाई आदमी के जमीर का कद छोटा कर देती है ? यह संकेत है कविता में और संदेश भी है कि यदि आदमी को यात्रा ,सफर करने की चाह भी है तो उसे सत्य के संज्ञान की खोज के लिए यात्रा करना चाहिए ।केवल सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने की यात्रा मामूली यात्रा है ।सत्य के ,न्याय के संवेदना के ,करुणा के , ज्ञान के नजदीक पहुंचने की यात्रा ही बहुत महत्वपूर्ण और अहम् है । यात्राएं आदमी को चमत्कृत अवश्य करती हैं ।मन को अपनी ओर आकर्षित भी करती हैं । सफ़र के हौसले आदमी में ताजगी और चेतना को स्फूर्ति भरे ज्ञान का उजाला भी देते हैं ।सफ़र हर बार नया अनुभव ,नये अहसास और अनुभूति को महसूस करने का माध्यम भी होते हैं । कहीं न कहीं सत्य को महसूस करने की चेतना का जरिया भी होते हैं सफर । मनुष्य मामूली से कुछ खास बन जाता है सफ़र करके ।ये सफर आदमी का बचाव करता है ।शख्सियत पैदा होती है ।पहचान बनती है । जब आदमी के पास अनुभव भरे उसूल आते हैं , विचार की ठोस जमीन बनती है तब यह यात्रा उसे एक मुकाम देती है ।एक शख्सियत बनाती है । संतृप्त का आधार ,सत्य का ज्ञान उसे समाज के नेतृत्व के दायित्व सौंप देता है । यह है यात्रा की ठोस लोकव्यापी चेतना । भ्रष्टाचार भरे आचरण के लिए या सत्ता का वैभव बटोरने के लिए की गई कवायद मामूली है किन्तु सत्य की खोज के लिए ,ज्ञान की प्राप्ति के लिए की यात्रा, हर समय, हर काल, और हर युग में महत्वपूर्ण है ।आदमी की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाली है । यशोपल्बधि देने वाली है ।यह सत्य के ज्ञान की जमीन हर हमेशा पुख्ता रहती है कभी धंसती नहीं कभी कमजोर नहीं होती और न आदमी को ही वैचारिक कमजोरी देती है। सड़कें हों ,रेल हो ,या हवाई यात्रा का सफर कहीं न कहीं सत्ताभिमुख ही होता है ।सत्ता की मेहरबानी पर होता है ,सत्ता के लिए होता है । जनता का हर सफर ,हर यात्रा अपनी जमीन की पुख्तगी तलाशने के लिए होता है ।कविता में संकेतों के जरिए बहुत से यथार्थ पर इशारे किये गये हैं । मामूली रुप से शब्द कहीं न कहीं का इस्तेमाल सर्व व्यापक अर्थों में हुआ है ।संकेत और संदेश देते इशारे आत्मबोध जगाते हैं ।वर्तमान यथार्थ का पर्दा भी खोलते हैं ।
विनीता रघुवंशी
