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एक साथ
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मैंने लिखनी चाही कविता
उसी क्षण
गोल में आ बैठी नन्हीं बिटिया
कविता लिखने के क्षण
वात्सल्य से भरे होते हैं
कविता लिखते लिखते
बेटी सयानी होगी
मुझे उसकी चिन्ता होगी
तब विदा की बेला में फूटेगी
बिटिया और मेरी आंखों से कविताएं साथ – साथ ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” पकी फसल के बीच ” से उद्धृत)
रचना करना भी सृजन है ।रचना लेखक की आत्मा से पैदा होती है ।बेटी भी आत्मजा होती है ।आत्मा से जन्मी ।कविता कर्म भी आत्मजा होता है पूरी तरह संतान की तरह विचार को पाला – पोसा जाता है ।जिस तरह संतान के भविष्य की चिन्ता की जाती है उसी तरह रचना के भी भविष्य की चिन्ता की जाती है ।गुण हीन रचना का सृजन समाज को दिशाहीन करता है ।समाज में इससे सम्मान और प्रतिष्ठा में कभी आती है ।इसी तरह गुण हीन और संस्कार हीन ,असभ्य संतान भी समाज में पालक की ,पिता की , अप्रतिष्ठा का कारण बनती है । जब रचना कार रचना करते समय अपनी रचना से वैसा ही सम्बन्ध महसूस करता है जिस तरह अपनी संतान से वात्सल्य भाव की अनुभूति में रचा बसा होता है । बेटी का घर – परिवार में जन्म लेना भी एक संवेदनशील अनुभव है ।उस पर पिता का लेखक होना और भी ज्यादा गहरी अनुभूति का अहसास है ।यह भी विचारणीय है कि कविता लिखते लिखते बेटी सयानी हो जायेगी ।आशय यही है कि उससे लगाव ,लाड़ – दुलार सब गहरा और संवेदना भी गहरी होती जायेगी ।आत्मजा से आत्मीयता का ममत्व बढ़ता जायेगा ।वह सांसों में घुल-मिल जायेगी ।बेटी भी सृजन है ।घर – परिवार को आबाद करने वाले दायित्वों से भरी । चिन्ता सिर्फ विवाह की नहीं वरन गृहस्थी की बसाहट को लेकर , उसके भविष्य को लेकर ,उसके सुख – दुख को लेकर , उसकी शिक्षा को लेकर ,संस्कार को लेकर , उसकी सीख को लेकर ,क्या नहीं है इस पिता की चिन्ता में शामिल ? पिता की अनुभूति सहज संवेदनशील है ।लेखन के साथ साथ बड़ी होती बेटी और बेटी की उम्र ही नहीं बढ़ रही बढ़ रहा है सयाना पन ,समझदारी , आत्म सजगता , दायित्व बोध , परिजनों के साथ लगाव ,दुलार , लाड़ – प्यार ,आत्मीय रिश्ते । यह सब समय के साथ बढ़ रहा है ।मायके के आंगन को लांघ ससुराल की दहलीज में प्रवेश की तैयारी के प्रति पिता की चिन्ता ? वहां सहज प्रेम की प्राप्ति ।यही तो है पिता के हाथों संवारा गया भविष्य । बेटी की इस विदाई में जो हृदय में समाया प्यार उमड़ेगा तब बेटी और पिता के आंसुओं से लिखी जायेगी कविताएं साथ – साथ ।आंसू संवेदना की सशक्त अभिव्यक्ति होते हैं ।आंसू निकलना ही सहृदयता की निशानी है ।कठोर हृदय कभी नहीं पसीजते याने उनकी आंखों में नमी नहीं होती । आंसूओं का बह जाना रुदन का स्वर नहीं है बल्कि हृदय की संवेदनशीलता है । आंसू हृदय का मर्म उलीच कर जगत के सामने प्रकट कर देते हैं ।यदि आंखों में आंसुओं की नमी नहीं तो वात्सल्य से भरा हृदय भी नहीं ।बेटी की विदाई की बेला आत्म श्लथ , क्षण होता है । जहां अहम का अहसास रत्ती भर नहीं होता वहां सिर्फ करुणा की द्रवण शीलता ही रहती है ।बेटी स्वयं आद्रता की परिपक्व अवस्था है और एक सहृदय पिता की संवेदनशील स्थिति को हर समय आद्र बनाए रहती है । आज वर्तमान समय में बेटी के प्रति समाज में जो क्रूरता ,बर्बरता, और असंवेदनशील व्यवहार दिखलाई देता है वह चिन्ता का विषय है ।बेटी है तो घर – आंगन में चहक बनी रहती है ।इस चहक का अनुभव ,अनुमान ,और अहसास कोई संवेदना मय हृदय ही कर सकता है ।
विनीता रघुवंशी
