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विनीता रघुवंशी
भूख का नाता
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प्रदूषण के करिश्मे दिखाता
जब भी सागर या नदियों को छेड़ता कोई
मैं अन्दर तक छटपटा जाता मछली – सा
मेरी भूख के लिए
समाधान जो है जलाशय !
ओजोन की पर्ते फाड़
जब भी कोई मारता आकाश पर झपट्टा
मैं अन्दर तक झुलस जाता
आंच खाई फसल – सा
मेरी भूख के लिए भरोसा जो है सूरज !
करता जब बादलों के साथ जब कोई
बारुदी धुएं की मिलावट
मैं अन्दर तक सका उठता निमोनिया – सा
मेरी भूख के लिए
रोटी की महक जो है बादल !
रौंदता कोई भी जब पहाड़ की फिजां
काटता जंगल
मैं अन्दर तक लहूलुहान हो उठता
लगा खाते दोस्त -सा
मेरी भूख के लिए भरा जाल जो है जंगल !
आदमी को टुकड़ा – टुकड़ा बांटकर
रचता जब भी कोई धरती पर फसाद
मैं अन्दर तक चिपक जाता अकाल – सा
मेरी भूख के लिए
सहभोज की परोसी पत्तल जो है धरती !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” पकी फसल के बीच ” से उद्धृत)
आज मानवता के हित के लिए ब्रह्माण्ड ने जो पंच तत्व धरती पर दिये हैं उन्हें हानि पहुंचाता विज्ञान , यांत्रिक आविष्कार ,भौतिक संसाधन और तरक्की को छूते समाज की वृत्ति बहुत ही घातक है । धरती का हर तत्व मनुष्य की ही नहीं प्राणीमात्र की भूख को शान्त करने का जरिया है ।ब्रह्माण्ड के क्षिति जल पावक गगन समीरा ये पंच भौतिक तत्व जीवन को संरक्षित करते हैं ।एक पर्यावरणीय चक्र का निर्माण करते हैं जिसमें जीवन संभव हो जाता है । आज विज्ञान ने और मनुष्य के ज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है कि वह बड़ी से बड़ी नदी का मार्ग रोक सकता है उसके बहाव की दिशा मोड़ सकता है ।सागर की गहराई में जाकर अतल – तल को भी छू सकता है । मानव के लिए अब सब संभव है । यह संभव ही मनुष्य के उस पर्यावरणीय चक्र को हानि पहुंचाता है और इसके दुष्परिणाम मनुष्य ही नहीं प्राणी मात्र के जीवन चक्र को असुरक्षित बना देता है । आधुनिक मनुष्य अपने जीवन चक्र की सुरक्षा के प्रति लापरवाह और अचेत है ।याने वह अपने जीवन चक्र को स्वयं ही नुकसान पहुंचा रहा है विज्ञान की भौतिक शक्ति के संबंध के भरोसे ? जहां जहां विज्ञान ने मनुष्य को यांत्रिक शक्ति प्रदान की वहीं वहीं मनुष्य ने नदियों को सागर को अपनी सीमाओं में बांधने की चेष्टा की उसकी यही चेष्टा ही उसकी प्यास पर भारी पड़ गयी ।आज आधुनिक मनुष्य शुद्ध पेय जल पाने के लिए तरह रहा है ।वह तरक्की के उन्माद में पानी की जीवन को बचाने की शक्ति को भूल गया ।वह भूल गया कि बिना पानी के , जलाशयों के सूख जाने पर वह फसलें कैसे उगायेगा ? भूख का नैसर्गिक संबंध तो पानी से ही है । इसलिए मनुष्य अपनी प्राथमिक जरुरतों के लिए अ चेत है ।याने उसमें चेतना नहीं है ,बोध नहीं है ,विचार नहीं है , चिन्ता नहीं है ,जागृति नहीं है ।जलाशय होंगे तब ही तो फसलें होंगी ? बिना पानी के खेती कैसी ? आज के मानव की सभी क्रियाशीलता से ओजोन की पर्वतों को नुक्सान पहुंच रहा है ।आज विज्ञान के साथ सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी शामिल होकर प्राणी मात्र के आसपास तनी हुई ओजोन परत को दूषित कर रहा है । गर्मी से आहत है हर मनुष्य और इसके लिए वह ए सी ,कूलर , और अन्य इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों का उपयोग कर रहा है ,पेड़ काट रहा है । हरियाली खत्म हो रही है और धरती पर भुरभुरा पन पसर रहा है ।यह चेतना हीन गतिविधियों के प्रति मानव समाज बेपरवाह है ।समाज की अस्थियां ही तो है जो उसके जीवन में रोग ,शोक और संताप का माहौल बना रही है । कविता में आदमी की भूख ही नहीं वरन प्राणी मात्र का जीवन आश्रित है इन भौतिक पंच तत्वों पर और मनुष्य है कि आत्म विस्मृति और तरक्की के अंध मोह में उलझा ,जीवन को खतरों , जोखिमों में डालकर भी सब कुछ पाना चाहता है ।वह चाहे उपलब्धि हो या मृत्यु दोनों ही उसे स्वीकार है ।रोग मिले या शोक ग्रस्त हो जीवन। वह तो भाग रहा है विज्ञान का हाथ थाम कर पाने के लिए । इस अहर्निश सफर में वह जीवन को हारता जा रहा है ।अपनी भूख को भूलता जा रहा है । वह उन प्राकृतिक तत्वों को नुक्सान पहुंचा रहा है जिनसे उसकी भूख का नाता है ।यदि सूरज न हो तो फसल पकेगी कैसे ? धरती को ऊष्मा और ऊर्जा मिलेगी कैसे ? बादलों पर यदि बारुद की धुंध मचेगी तो निर्मल वायु कैसे मिलेगी प्राणियों को ।जीवन ही असंभव हो जायेगा ।आदमी को यदि कुछ त्याग करना है तो वह है हिंसा का त्याग जिससे बारुद का धुंआ प्राणियों को क्षति न पहुंचाये ।उसकी रोटी की महक शुध्द बनी रहे ।जंगल पर आज वर्तमान में उनकी अहमियत को भूल कर बेतहाशा काटे जा रहे हैं । समाज इस कटाई के प्रति आस्था है ।वह नहीं सोच पा रहा कि जंगल अपने से प्राणियों के और खुद मनुष्य के जीवन पर संकट खड़ा हो जायेगा ? इसलिए एक एक मनुष्य को जंगल कटने का विरोध करना चाहिए ।क्योंकि जंगल में जो फल फूल और कंद मूल स्वत: उग आते हैं वह मनुष्य ही नहीं जंगल में विचरण करते पशु और पक्षियों की क्षुधा सहज ही शान्त कर देते हैं । जंगल में आम है ,जाम है ,कटहल है जामुन है और न जाने क्या क्या हैं जो प्राणियों की भूख का शमन करते हैं । जंगल काटना बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी खास दोस्त का लगा करना ।धोखा देना ।भरोसा तोड़ना ।आक्सीजन ही या शुद्ध वायु ही तो प्राणियों की मित्र हैं ।उसी का न मिलना ? कितना बड़ा धोखा है ? यह विचारणीय विषय है । क्या समाज इस तरह के प्राणी – विरोधी कृत्यों के प्रति सजग होकर जंगल काटे जाने की एकजुट खिलाफत करेगा ? कविता में गिनाये गये सभी कृत्य मानव विरोधी हैं ? इन का सीधा असर मनुष्य की भूख पर पड़ता है ।यह कृत्य प्राणी मात्र के जीवन पर किया जाने वाला संगीन अपराध है जो कहीं भी दिखाई और दर्ज नहीं किया जाता और न ही इसकी कहीं प्राथमिकी ही लिखी जाती है ? आदमी को इतना आत्म सजग और चेतना सम्पन्न तो होना ही चाहिए कि जीवन पर संकट खड़े किये जाने वालों के प्रति अपना आक्रोश ,अपना तीखा गुस्सा , अपनी एकजुट शक्ति का प्रदर्शन सख्ती और असरदार तरीके से करे ? यदि यह नहीं समझ सकता ,बोध नहीं रखता या लापरवाह है तो एक न एक दिन समस्त मानव जाति ,मानव समुदाय ,प्राणी समाज ,जीव जन्तु , पशु – पक्षी सब का जीवन जोखिम , खतरों, और संकट में डूबा होगा ।क्या समझ दार मनुष्य उसी दिन का की प्रतीक्षा कर रहा है ? क्या उसी संकट , उसी संताप ,उसी रोग ग्रस्त समाज ,उसी शापित जीवन का इंतजार कर रहा है ? आज मनुष्य को अपने आसपास फैले प्रदूषण के प्रति व्यक्तिगत तौर पर चिन्तित और सजग चेतना का परिचय देना ही होगा । धरती पर सेहत , स्वास्थ्य, और जीवन को अनमोल बनाते इन ब्रह्माण्डीय तत्वों का महत्व तो मनुष्य को ही समझना होंगे । यह तत्वों को बचाए ,बनाए रखने की चिन्ता ही संवेदना और मनुष्यता है ।
