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विनीता रघुवंशी
मखौल उड़ाते लोगों से
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पसीने का तुम्हें
जितना भी मखौल उड़ाना हो उड़ा दो
लेकिन जिस वक्त
कविता तुम्हें देखना शुरु करेगी
वह तुम्हारी मौत तक
शब्दों की लंबी कतार खड़ी कर देगी
जिसमें यदि चींटियां भी दाखिल हुई तो —
वे भी तुम्हारी हकीकतों का बयान करेंगी
जितनी देर तुम फक फक कर रहे होंगे
मैं एक कविता पूरी कर चुका होऊंगा
माएं बच्चों को दूध पिला चुकी होंगी
फूल खिल खिल खुश्बू बिखेर चुके होंगे
और पकी फसल के बीच खड़े
किसान की दुआएं –धरती के लिए
तृप्ति की धूप सकेल रही होंगी
तुम्हें जितना भी मखौल उड़ाना हो
उड़ा लो
लेकिन तुम अपनी ही रोशनी से ग़ाफ़िल
एक बंद सूरज मुखी तो अब भी हो ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” पकी फसल के बीच ” से उद्धृत)
मखौल ,उपहास ,हंसी उड़ाना ,या किसी के काम को हेय समझना ,यह मनुष्य की प्रबल प्रवृति है ।वह हमेशा अपने गुण ,अपने काम ,अपने आपको खास समझता है और दूसरे के काम को कमतर आंकता है । जिस काम से धन की प्राप्ति हो , जिस काम को करने से आमदनी हो और आजीविका चलती हो वे सभी काम और व्यवसाय समाज में श्रेष्ठ समझे जाते हैं ,किन्तु यदि समाज की उन्नति और तरक्की के लिए चिन्तन किया जाये ,उसकी संवेदना को परिष्कृत करने के लिए साहित्य सृजन किया जाये या उन विषयों पर तर्क – वितर्क करके समाज को दिशा दी जाये तो यह सब कर्म फालतू हैं , साहित्य चिन्तन कागज काले करने के काम हैं । यदि समाज में से विचार करने की क्षमता छीन ली जाये तो पूरा समाज विवेक शून्य और दिशा हीन विक्षिप्त की तरह दिखाई पड़ने लगेगा ।समाज में साहित्य मनीषी ही वे सजग अध्येता हैं जो समाज की बेहतरी और तरक्की के रास्तों पर विचार करते हैं। वे संस्कृति के मानवीय मूल्य और चेतना पर केन्द्रित विचार वान सभ्यता का निर्माण करने में योगदान देते हैं । मखौल उड़ाना या उपहास उड़ाना कोई सार्थक काम नहीं है । जितनी देर मखौल उड़ानें के बिन्दु टटोले जायें या विचार किया जाये उतनी देर में बहुत सारे सार्थक काम चुटकियों में निपटाये जा सकते हैं । जैसे फूलों का खिलना और उनकी खुश्बू से पूरे वातावरण में सुगंध फैल जाना ।किसान का फसलों के बीच खड़े होकर संसार भर के लिए तृप्ति की दुआएं मांगना । धूप का खिलना और फसल का पक जाने जैसे विशेष काम का हो जाना । किसान का निरंतर श्रम में डूबना भी पसीने की महक है । यह काम उपहास या मखौल उड़ानें जैसा स्तर हीन काम नहीं है ।साहित्य सृजन भी श्रम पूर्ण कर्म है ।यह केवल कागज काले करने का मामूली काम नहीं है ।साहित्य सर्जक को निरंतर अध्ययन,और स्वाध्याय मनन, चिन्तन ,शोध और खोज से जुड़ा रहना पड़ता है । यह निरंतर सोचने और विचारने की प्रक्रिया होती है ।उसके बाद ही कोई लेखक अपने बहुमूल्य विचारों की मणियां समाज के सामने प्रस्तुत करता है । मनुष्य की विचार शीलता ही उसे अन्य प्राणियों से , पशुओं से , पक्षियों से अलग – थलग करती है । इसीलिए मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । मनुष्य की चेतना ,उसका चिन्तन ,उसका बोध ,उसका आत्मज्ञान सब जब अन्यों से अलग होता है तब ही उसकी संवेदना और करुणा उसे लेखक बनाती है ।समाज में लेखक का स्थान सर्वोपरि होता है ।समाज के लिए चिन्तन करना ,शोध करना ,समाज की चेतना को जागृत करना , उसे पतन और मूल्यों के प्रति आगाह करना , मर्यादाओं के प्रति सजग करना , समाज की अगुवाई करने जैसे महत्वपूर्ण कार्यों का दायित्व लेखक ही उठाता है । इसलिए उसके कर्म को मामूली नहीं समझा जा सकता है । लेखक ही समाज के महत्व और पारिवारिक संस्थाओं ,रीति -रिवाजों की गरिमा का अर्थ समझाता है। यदि ऋषि वाल्मिकी नहीं होते तो श्रीराम की कथा का परिचय समाज को कैसे मिल पाता ।यदि श्रीमद गीता नहीं होती तो श्रीकृष्ण की राजनीति ,न्याय ,और अन्याय के लिए किये गये संघर्ष की रणनीति का परिचय कैसे मिलता ? इसलिए धनार्जन महत्वपूर्ण होते हुए भी लेखन कर्म सबसे महत्वपूर्ण है ।समाज के सभी व्यवसाय आजीविका और धन – सम्पन्न बने रहने के लिए आवश्यक है किन्तु लेखन और लेखक समाज के हित चिन्तन के लिए सबसे बड़ी जरुरत है । जो मखौल उड़ा कर खुश होती है और अपने मनोविकारों की संतुष्टटी करते हैं वे अपने अन्दरुनी गुणों से अपरिचित रहते हैं ।उनके अन्दर भी गुणों की रोशनी होती है । संवेदना होती है ।करुणा होती है ।सेवा का निष्कपट भाव होता है लेकिन बिना विचारे जीवन जीने की दृष्टि विकसित होने के कारण वे अपना समय मखौल उड़ानें में व्यर्थ बर्बाद करते रहते हैं । उनका सीधा सवाल होता है कि — आपके लिखने से क्या होगा ? क्या समाज सुधर जायेगा ? आप भले ही कागज काले करते रहो ? समाज में कोई बदलाव नहीं होगा ? ये कुछ नकारात्मक बिन्दु होते हैं जो लेखन की वृत्ति को पनपने नहीं देती ! लेखक होना समाज के भीतरी बदलाव के लिए बहुत जरुरी होते हैं ।अपने अंधेरों से और अपनी चेतना की रोशनी से वाकिफ होने के लिए खुद पर सोचना भी बहुत बहुत जरुरी होता है । यह खुद के प्रति सजग और सचेत होने के लिए लेखकों को पढ़ना ,समझना , और चिन्तन करना समाज के स्वभाव में शामिल होना चाहिए । हर पढ़ें लिखे व्यक्ति को साहित्य के अध्ययन की आदत होनी चाहिए ।तब वह मखौल उड़ा कर संतुष्ट नहीं होगा ।वह फिर आत्मज्ञान , आत्म सजग और आत्म चेतना से अनुप्राणित होगा ।
अपने अन्दर की कुण्ठाओ ,ग्रन्थियो , तनावों जैसे मनोविकारो से मुक्त होगा ।
