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बेटी का दूसर खत
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पत्र के जवाब में
बेटी ने ससुराल से लिखा है —
तुम मुझे जीवन राग के वास्ते
जो बातें लिखते हो
वे मेरी समझ में तो झट्ट आ जाती हैं बापू
लेकिन ससुराल वाले
जब मेरा खत पढ़ते हैं
तो अन्दाजने लगते हैं, कि —
बहू में जरुर कोई खोट
तभी तो उसका बाप
हरेक खत में नसीहतें लिखता है
बापू ! तुम अपने जैसा
और अब तक
पारदर्शी समझते रहोगे सभी को
और कब तक
पालते रहोगे भावुकता के भ्रम
फिर भी मेरी बात
गंभीरता से मत लेना बापू !
बेटी के ख़त में इतनी इबारत के बाद
कुछ लकीरें कोरी पड़ी हैं
जहां आंसुओं की लड़ी है
अंत में आड़ी तिरछी लिपि में लिखा है
शेष कुशल है पिता !
आपकी बेटी अपराजिता !!
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” पकी फसल के बीच ” से उद्धृत)
बेटी का खत ससुराल से अपने मनोभाव व्यक्त करता हुआ । पिता जीवन को रागमय ढ़ंग से व्यतीत करने की नसीहतें बेटी को समझा रहा है जीवन तनाव के लिए नहीं प्रेम के लिए है ।जीवन में कुण्ठा रहित जीना ही जिन्दगी है ।ससुराल के परिजनों के साथ ग्रन्थियो को नहीं बांधना वरन प्रेम भरा साहचर्य बनाना ही जीवन की सहजता है । ये सीख एक पिता अपनी बेटी को ससुराल में अपना स्थान बनाने की समझ दे रहा है । यह समझाना भी कभी कभी पिता के लिए ग़ैर मौजू हो जाता है ।लगता है बहू जरुर क्रोधी स्वभाव की है जो उसका पिता बार – बार ससुराल में सौहार्द बनाने की समझ दे रहा है ।ससुराल एक ऐसी जगह है जहां स्त्री को अपनी हर पल परीक्षा देनी होती है ।ससुराल का हर परिजन बहू को तरह तरह से परखता है ।स्वभाव को, गुण को ,ईमान को ,समर्पण को, निष्ठा को ,पाक कला और अनुशासन को ,अल्हड़ता और मर्यादा पालन को , प्रेम को, आत्मीयता को , गंभीरता और विचार क्षमता को , ससुराल में बहू कसौटी पर चढ़ा कुंदन होती है जहां हर क्षण उसे तपना है ,त्याग और समर्पण के प्रमाण देना है ।यह है ससुराल गयी बेटी का खराद पर चढ़ा जीवन जहां निष्ठुर या को ,कठोरता को अपने अनुकूल प्रियत्व में परिवर्तित करने के गुर ,तरीके अपनाना ही सबसे बड़ी नसीहत होती है ।पिता केवल कन्यादान ही नहीं करता वरन बेटी के जीवन में आने वाले दुख ,संताप,पीड़ा ,भावनात्मक रिक्तता के प्रति चिन्तित भी रहता है । इसीलिए वह निरंतर बेटी को भावनात्मक रुप से होने वाली चूकों के प्रति सचेत ,सजग करता रहता है । ससुराल में व्यतीत हर पल हर क्षण बेटी के लिए परख का लम्हा होता है ।मायके की सीख को समझने का पहला पायदान होता है ।पिता पारदर्शी है ।भावुकता के भ्रम में डूबा हुआ है और बेटी यथार्थ से रु – ब- रु हो रही होती है ससुराल में ? पिता का खत बेटी के लिए एक भ्रम की रचना करता है ससुराल में और बेटी आगाह करती है उस भावनात्मक भ्रम के प्रति । जो एक पिता अपनी बेटी से उम्मीद करता है । ससुराल में सबके साथ साझा जीवन के अनुराग को महसूस करती बेटी की कल्पना एक सुलझा हुआ पिता ही कर सकता है ।पिता के मन में बेटी को लेकर सहज विश्वास है लेकिन बेटी के ससुराल में पिता को लेकर बहुत सी दुरुह उलझनें और मतिभ्रम है ,अविश्वास है इसीलिए बेटी चिन्तित है ।पिता को सजग करती है । खत में कुछ लकीरें कोरी है ? इन कोरी लकीरों को देखकर बेटी की असहजता का अनुमान पिता की संवेदनशील मन को मर्म से भर देता है । बेटी का शेष कुशल भी पिता के मन को मर्माहत कर देता है ? यह शेष कुशल की इबारत में बहुत कुछ अनकहा और अनलिखा रह गया ।वह सब कुछ जो व्यक्त होने से छूट गया ? क्या एक पिता बेटी के इस शेष कुशल के संदेश और संकेत को समझ पायेंगे ? ससुराल की विषमताओं में जीवन व्यतीत करती बेटी का यह “शेष कुशल” उसके समझौतों की असलियत खोल देता है ।फिर भी वह पिता की अपराजिता है ? याने हारती नहीं है ! वह हर कठिन परिस्थितियों का सामना दृढ़ता से करती है ।अपराजिता याने न हारने वाली ।बेटी का यह अपराजित रुप ही सर्वस्वीकृत है । यही उसे कन्या से वामा और चेतना से महिला गृहस्थी में धुरी और समाज में जगत जननी बनाती है । यह बेटी के ही रुप की सर्व व्यापकता और पिता की सीख का कल्याण कारी रुप है । पिता की मंगल कामनाओं का नतीजा है ।बेटी अपराजिता है ।
विनीता रघुवंशी
