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बेटी का पहला ख़त
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बेटी ने लिखा है —
बापू ! आंगन की मुट्ठी भर धूप भेज दो
लिखा है
थोड़ी – सी पत्तियां ही पड़ा दो
बाड़े वाले आम की
घिनोची में फुदकती
गौरैया की चहक मांगी है पगली ने
अन्त में लिखा है —
ढेर – ढेर बातें लिखना चाहती हूं बापू
लेकिन अपनी गिरफ्तारी को झुकाती फटकती
तुम्हारी नसीहतों के सपनों को
सुलझा रही हूं फिलहाल
ताकि चलती रहूं
अपने पांव अपनी चाल ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —- ” पकी फसल के बीच ” से उद्धृत)
बेटी का मायके से भावनात्मक लगाव और मायके की छांव का महत्व बेटी बनकर ही समझा जा सकता है ।बेटी के अपने मायके से जो लगाव होता है वह सिर्फ महसूस किया जा सकता है ।मायके की उन्मुक्तता और भरपूर भरोसा बस बेटी ही समझ सकती है ।मायके की छोटी से छोटी चीजें भी ससुराल में महत्वपूर्ण हो जाती है ।ससुराल में बेटी को क्या चाहिए ।आंगन का वह खुलापन जहां धूप अपनी रोशनी फैला देती है ।यह धूप आंगन का उजाला और ऊष्मा ही नहीं वह मन की मुक्ति भी है जो ससुराल की पाबंदियों से , मर्यादाओं से आजाद हैं । धूप में वह ताजगी भी है ।जो ससुराल की जिम्मेदारी निभाते हुए स्फूर्ति देती है ।वे बचपन से लेकर युवती बनने तक में साथ रहे मित्र , सखियां ,परिजन ,आस – पड़ोस के मुंह बोले रिश्ते नातों का भरा-पूरा परिवार है । जहां केवल आत्मीयता ही आत्मीयता है ।लगाव ही लगाव है ।बाड़े के आम का वह खट – भिट्ठा स्वाद है जो सूदूर ससुराल में महसूस नहीं होता ।अक्सर घरों के आंगन में पीने का पानी आंगन में रखा जाता है और गौरैया चिड़ियां इन रखें मटकों के आसपास अपनी प्यास बुझाती फुदकती रहती है ।इन फुदकती चिड़ियों की चहक भी बेटी को याद आती है ।इन चहकती चिड़ियों के साथ फुदकना और चहकना बेटी का प्रिय खेल था वहीं चहक अब ससुराल में भी चाहिए । पिता का दुलार भी है — चहक भी मांगी है पगली ने ।कितना सौहार्द भरा इन शब्दों में । बाड़े वाले आम की सुगंध भरी है मन में इस लिए उसकी पत्तियां ही चाहिए ।आंगन की मुट्ठी भर धूप चाहिए ।कितनी सहज मांग है ।वह उत्साह चाहिए। वह उमंग चाहिए । वह तरंग चाहिए ।वह सहज खिलंदड़ा पन चाहिए । मायके की चार दीवारी के सहज साहचर्य चाहिए । ढेर ढेर बातें लिखना चाहती हूं पर मन अनजाना संकोच और झिझक है ।घर के दायित्व हैं और गृहस्थी को संजोना है ।गिरस्थी को झुकाती फटकती है।उसमें से जो बेकार है उसे बीनती है , जो कचरा है उसे फटकती है ।यह प्रक्रिया वह अनाज के साथ नहीं दोहराती वरन गिरस्थी को जो उजाड़ रही हैं बातें ,पुराने विचार ,अंधविश्वास , बेतुकी मर्यादाएं , गिरस्थी की चाल बिगाड़ती पाबंदियां इन सबको भी तो नुकाना है ।फटकना है । अन्त में बेटी को पिता की नसीहतें ,समझाइशे याद आती हैं ।अपनी गृहस्थी को अपने सपनों के अनुकूल रचने की कोशिश जिसमें पिता के विचार भी शामिल हैं ।वह रच रही है अपनी गृहस्थी । उसमें दृढ़ता है ।निर्णय लेने की क्षमता है ।अपने चाल से अपने पांवों से अपनी गृहस्थी को संवार सकते ।यह गृहस्थी को आबाद बनाने के सपने हैं यह गृह प्रबन्ध के तरीके हैं जहां एक सफल गृहस्थी की बुनियाद डाली जा रही है ।यह वह परम्परा गत विचार है जिसमें बेटी को गृहस्थी को व्यवस्थित करने के ढंग सिखाए जाते हैं ।आज वर्तमान में ऐसे बहुत से घर उजड़ें मिलेंगे जहां बेटियों की कमतरी ,गृह प्रबन्ध के गुर न आने के कारण तलाक की स्थिति तक जा पहुंचे हैं ।समाज में तलाक आदि की समस्याओं से गृहस्थी ही नहीं वरन समाज की चेतना आत्मीयता और संवेदना को भी धक्का पहुंचता है ।यह बेटी के जीवन पर भी एकाकी पन का आघात पहुंचाता है ।पिता और परिजनों का प्यार – दुलार बहुत ही अच्छा और अनूठा होता है लेकिन हमेशा सलाह और मशविरे उन्हें आबाद होने के ही दिए जाने चाहिए ।ऐसी सीख दी जानी चाहिए जिससे अपनी गृहस्थी की जिम्मेदारी को वह मजबूती से ,दृढ़ता से , वैचारिक समझदारी से निबाह सके । उसमें अपने ससुराल को भी अपना घर समझने की सीख हो ।ये सब मसले बहुत मामूली होते हैं लेकिन मायके का सहारा मिल जाने पर इन से गृहस्थियां चटक जाती है ।मायके की याद भले बेटी के मन को लुभाती है किन्तु ससुराल के घर गृहस्थी को तरतीब देना भी ,उसका खास ख्याल रखना भी ,उसे जोड़े रखना भी बेटी का ही दायित्व होता है । ससुराल से पहला ख़त बेटी का बड़ा संवेदना से भरा है । सीख ही बहुत महत्वपूर्ण होती है ।सीख से घर बर्बाद भी होते हैं और आबाद होकर वंशानुगत प्रतिष्ठा हासिल करते हैं ।
विनीता रघुवंशी
