Home आज की कविताजिनसे-पकी फसल के बीच

जिनसे-पकी फसल के बीच

by Dr. Vinita Raghuvanshi
जिनसे
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जिनसे तंग आकर
आत्महत्या तक पहुंची औरत
वे भी
अपनी पूरी सुरक्षा के बाद
बचाने दौड़े उसे
और जब
भेजी गई लाश पोस्टमार्टम को
तो लपककर
चीलघर की मिली पर जा बैठे हत्यारे
यह देखने कि
आखरी पत्ते के झरने तक
पत्थर का मौसम बना रहे
ताकि बसंत की कोंपलों के आने तक
हत्यारों के विरुद्ध
गवाही का एक भी सबूत न रहे ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —-” पकी फसल के बीच ” से उद्धृत )
आज की कविता बेहद संवेदनशील है ।कविता में “जिनसे ” एक सर्वनाम है । यह कविता को और भी गंभीर संकेतों से भर देता है । समाज हर काल और समय में स्त्री को अबला माना जाता रहा है ।उसकी सामाजिक स्थिति भी हमेशा दोयम दर्जे की मानी जाती रही है ।समाज पुरुष सत्तात्मक बने रहे इसलिए स्त्री की महत्ता भी वे अपने स्वार्थों ,अपने आशयों , अपने मतलबों ,अपने हिसाब से स्त्री का स्थान ,अवस्था ,हैसियत , दशा तय करते रहे । वह लक्ष्मी है ,वह सरस्वती है ,वह दुर्गा है ।यह तीनों रुप स्त्री के समाज ,धर्म, और चेतना के आधार पर निर्धारित किये जाते हैं , पूजे जाते हैं ।हर समय और काल में स्त्री महिमा मरी होती है ।वह गृहस्थी की धूरी है और धूल भी ।वह धन की संरक्षिका है तो भंडार की स्वामिनी भी ,वह सेविका है तो अधिकारिणी भी । यह सब स्थिति उसकी आज्ञा पालन , सदाचार , यंत्रवत जीवन , मूक, बधिर और मतिहीन बनी हुई अवस्था के एवज में प्राप्त है ।वह सरस्वती है लेकिन अपनी बुध्दि चातुर्य का इस्तेमाल नहीं करना है । वह सिर्फ धन की संरक्षिका है ।वह पशुवत जीवन की अधिकारी है । इसीलिए वह हर काल में केवल औरत याने भोग की सामग्री के उनमान में गिनी जाती है ।वह समाज के लिए वस्तु है — वह जन्म देने वाली है ।वह आनंद और सुख की दाता है ।समाज के लिए औरत है ,मनुष्य नहीं । इसीलिए समाज में उस पर तरह तरह के अत्याचार ,अमानवीय कृत्य, शोषण ,दासत्व, और पीड़ा तथा यातना बलात्कार का व्यवहार किया जाता है । वह समाज की सम्पत्ति मानी जाती है । इसलिए यहां – ” जिनसे ” सर्वनाम का प्रयोग किया गया है ।यह सर्वनाम में सभी शामिल हैं जिन्होंने अत्याचार किया ,आत्महत्या करने को मजबूर किया और जिन्होंने अत्याचार होते देख कर भी चुप्पी ओढ़े रखी ।वे सब इस आत्महत्या को कराने वाले हत्यारे हैं ।वह न्याय व्यवस्था भी जो न्याय का दंभ ढोती है । कविता पहले सर्वनाम से घटना की ओर मुखातिब होती है लेकिन फिर समाज , परिजन ,परिवार ,न्याय ,इंसाफ के उस चेहरे को हत्यारा कहकर उजागर करती है जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से इस हत्या में शामिल हैं ।जो न्याय व्यवस्था गवाह और सबूत पर आश्रित है वह न्याय का ढोंग भर है ।वह सच्ची न्याय व्यवस्था नहीं ।जिसके गवाह बने बनाए हैं , जिसके सबूत बनाए और बिगाड़े जा सकते हैं । जहां सुरक्षा देती संस्थान ,पुलिस , सुरक्षा बल सब बिकाऊ हों जहां वेतन से ज्यादा रिश्वत से चूल्हे जलने की आश्वस्ति हो ।ऐसी सुरक्षा व्यवस्था ,ऐसी न्याय व्यवस्था से इंसाफ की उम्मीद बेमायने है। वे लोग जो समाज के रखवाले हैं और बलात्कार ,अत्याचार ,अमानवीय हालातों में शामिल रहे हों जिन पर औरत को मजबूर ,लाचार ,और विवश कर दिया हो मरने के लिए ।याने मृत्यु के अलावा किसी औरत के पास जीने का कोई विकल्प न बचा हो ।ऐसी दशा में न्याय को पूर्णतः निरभ्र कर देने की चालाकियों में डूबे हत्यारे फिर से मौज – मस्ती के मौसम के आने के मौके फिर से रचना चाहते हैं और उनके विरुद्ध एक भी सबूत बाकी न रहे इसके लिए हर समय हर काल में चाट – चौबंद रहते हैं ।यह सब व्यवस्था की कमियों और समाज की सोई चेतना का खुलासा है ।समाज की यदि एक भी औरत इस तरह की परिस्थितियों में फंसती है तो इसमें पूरा समाज हत्यारा समझा जाना चाहिए क्योंकि औरत भी मनुष्य है ।सामाजिक प्राणी है ।उससे पूरे होते स्वार्थ , संरक्षण , और आनंद का तो समाज भागीदार है लेकिन उसके जीवन और मृत्यु के पक्ष से वह अलग – थलग है । यहां तक की खुद स्त्री में भी औरत के साथ होती नाइंसाफी पर कोई चेतना नहीं होती ।वह भी समाज में होती हुई निरापद घटनाओं , हत्याओं , और मौतों पर विचार हीन दशा में खामोश रहती हैं ।यह अवस्था ,यह स्थिति किसी भी औरत के साथ हालात बन कर गुजर सकती है ।हर औरत घर – गृहस्थी की धुरी होती हुई ,मातृत्व का भार ढोते हुए भी नितान्त अकेली होती है ।उसके साथ चूल्हे – चौके में साझा जीवन व्यतीत करती हुई औरत भी साथ देने से मुकर सकती है ।औरत के साथ बलात कृत्य पुरुष का आकर्षण है ।औरत शब्द पर भी यहां ध्यान देने की जरुरत है ।औरत और मर्द इस संसार की दो जातियां हैं । पुरुष अपने को औरत से श्रेष्ठ समझता है और उसे कमजोर मानकर उस पर हमला करता है । औरत बुद्धिमती होती है ।अपने छोटे – छोटे स्वार्थ पूर्ति के लिए वह सर्वस्व समर्पण करती है । यही प्रेम की लालसा उसे बुध्दि से देह तक ले आती है ।इस तरह अबला बनी औरत मर्द के अहंकार से तंग होती है । यह तंग करता मर्द पिता भी होता है ,भाई भी होता है ,पति भी होता है ,प्रेमी भी होता है , अन्य पुरुष भी होता है ,कुल मिलाकर वह केवल मर्द होता है । औरत के लिए वह मृत्यु जैसे हालात पैदा करता है । कविता में न्याय व्यवस्था से लेकर राजनीतिक व्यवस्था , सुरक्षा व्यवस्था , और सामाजिक चेतना का वह विचार विहीन ढांचा भी प्रश्नों से घिरा है ? जहां विचार की चेतना का होना बेहद महत्वपूर्ण है ।औरत केवल पशु या दास नहीं वरन वह चेतना सम्पन्न मनुष्य है ।वह सोच सकती है ,विचार कर सकती है ,फैसले ले सकती है , वह आश्रित नहीं वरन सफल अस्तित्व की स्वामिनी है ,उसके जीवन की अस्मिता गंभीर विचार का विषय है । अपनी अस्मिता पर खुद “औरत” को विचार करना होगा ? औरत का जीवन निर्मूल्य नहीं उसका भी मूल्य है । 🙏 विनीता रघुवंशी

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