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विनीता रघुवंशी
मित्रवर
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बहुत दिन हो गये
न नदियों को हवा खाते देखा
न पहाड़ों को पानी पीते
न जंगलों को आग खुरचते
न बीजों को माटी मिलते
बहुत दिन हो गये आकाश देखे
सूरज – चांद – तारों का प्रकाश देखे
चलो ! किसी दिन
अपने सतपुड़ा में चल चलें
और देखें वह दृश्य
चलो मित्रवर
किसी दिन अवश्य !
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह —– ” पकी फसल के बीच ” से उद्धृत )
मनोभाव की कविता है । नगरों , महानगरों , कस्बों में, जिस तरह की जीवन शैली है उसमें एकरसता बहुत है या कहें कि यह जीवन शैली नीरस है । न इसमें आत्मीयता की मिठास है न नोंक – झोंक ,न रुठना न मनाना ,न आग्रह न मनुहार ।इस तरह सरसता रहित जिन्दगी में जिस घनघोर रिक्तता का अनुभव होता है ।उससे छूटने के लिए ,उस रिक्तता से उबरने के लिए शहरी आदमी प्रकृति की ओर लौटना चाहता है ।यह लौटने की इच्छा ही उसे जीवन्त बना देती है । नदियों को हवा खाते देखने की इच्छा कितनी मनमोहक है ।यह कल्पना की नदियों में उठती लहरें कितनी आकर्षक और मनोहारी दृश्य है जो देखने वाले को भी चंचल बना देती है ।हवा की गति को नदियों की लहरों में उछलते – उमड़ते देखना याने अपने मन की स्थिरता को , अपने मन के खालीपन को लहरों की चंचलता से भर देने का प्रतिबिम्ब रुप रच लेना ।उस ऊब को पौंछ देना जिसने मन को उदास कर दिया है । न पहाड़ों को पानी पीते पहाड़ का पानी पीना भी प्रतीकात्मक है ।पहाड़ों पर जीवन बसर करते आदिवासी , वनवासियों का अपनी प्यास की तृप्ति का दृश्य भी चित्ताकर्षक है ।बरसात में तो पहाड़ों में जीवन बसर करते वनवासियों की प्यास ,पानी की आपूर्ति सहज हो जाती है लेकिन बरसात के अलावा अन्य ऋतुओं में पानी को तरसता ,पानी जुटाता पहाड़ी जीवन के संघर्ष को करीब से देखना भी जीवन का अनुभव ही है ।यह अनुभव और कठिनाई का अहसास महानगर,नगर या कस्बों में घर तक नल आने वालों को नहीं हो सकता ? पहाड़ों की जिन्दगी की दूभरता ( असुविधा ) वहीं जाकर करीब से महसूस की जा सकती है ।न जंगलों को आग खुरचते यह आग खुरचना भी एक जीवन का प्रतिबिम्ब है । आदिवासी और वनवासी जीवन बाहरी भौतिक संसाधनों से बहुत दूर होते हैं ।उनकी जीवन शैली मानवीय संसाधनों पर ही आधारित होती है । वे अपनी आग को कभी भी बुझाते नहीं है वरन् चूल्हे में आग को राख के बीच दबा कर रखते हैं ।जरा सी चूल्हे की राख खुर्ची और दो – चार फूंक से ही आग को परचा लिया ।चूल्हा फिर सुलग उठा ।यह है आग को खुरचना ? चूल्हे में खोंसी गई लकड़ी में आग धुंधलाती रहती है और जरा सी फूंक से आग का चमक जाना वनवासी जीवन का बहुत बड़ा करिश्मा ही है । वनवासी जीवन की यह आग खुरचना भी उनके जीवन जीने के तौर तरीके हैं जिन्हें देखना शहरी मनुष्य के लिए कौतुहल का विषय ही है ।आदिवासी जीवन को निकट से देखने , महसूस करने की इच्छा कोई साधारण नहीं वरन यह इच्छा असाधारण और विशिष्ट है ।खास है उन कठिनाई भरी जिंदगी को आसानी से जी लेना । असंभव हालातों में से सरलता खोज लेना ,अपने अनुभव,अपनी जीवन शैली की रचनात्मकता को बचाये रखना ,उन तरीकों को अपनाकर जीवन व्यतीत करते रहना भी मुश्किल भरा होता है ।ऐसे जीवन को करीब से देख लेना भी अनुभव में वृध्दि करता है ।”न बीजों को माटी मिलते ” खेत में बीज रोपने ,खेतों में फसल के लिए बीज बोते देखने के दृश्य भी बहुत ही सुन्दर होते हैं ।यह दृश्य मेहनत करते किसान की जिंदगी से जुड़े होते हैं जहां होती है मौसम से ,प्रकृति से उम्मीद ,आशा , जीजीविषा । जहां किसान निस्वार्थ भाव से न जाने ,अनजाने लोगों की क्षुधा शान्ति के लिए अपने पसीने की बूंदें खेतों में गिराता है और बीज जब फसल बनकर तैयार होते हैं तो फसल को मेहनत का नतीजा समझकर किसान आनंदित होता है ।बीज जब माटी में मिलते हैं तब ही तो फसल लहलहा उठती है ।किसान को खेत में मेहनत करते देखना भी दिलचस्प उत्साह का संचरण करता है ।एक उमंग मन को सराबोर कर देती है । खेत की बुआई का दृश्य भी मन की नीरस अवस्था को रससिक्त कर देता है । महानगरों की गगन चुम्बी इमारतों में बंदी जीवन जीते हुए सूरज ,चांद , तारों को देखना शहरी आदमी के लिए बहुत कठिन हो गया है ।वह दिन भर एक कृत्रिम जीवन शैली की पाबंदियों में जिन्दगी व्यतीत करता है और यह भूल ही जाता है कि। जिन सूरज ,चांद , तारों के साथ उसने अपना बचपन सहज तरीके से बिताया आज वही सूरज ,चांद ,सितारे वयस्क ,प्रौढ़ ,और बुजुर्ग हो जाने से वे इतने अदृश्य क्यों हो गये ? चलो चलें किसी एक दिन अपने सतपुड़ा में चल कर इन दृश्यो को देखें कितनी । यहां यह दृष्ट्या है — ” अपने सतपुड़ा ” याने सतपुड़ा अभी भी मन के भीतर रचा – बसा है ।उससे अपनत्व का भाव बंधा है ।सतपुड़ा से आत्मीयता और मेलजोल अभी खत्म नहीं हुआ । सतपुड़ा का सघन वन अब भी मन में हिलगा हुआ है । सतपुड़ा को निहारने की मनोइच्छा , किसी एक दिन अवश्य ! अपने दोस्तों के साथ प्रकृति के करीब लौटने की अभीप्सा में कितनी – कितनी बेकरारी है ।एक व्याकुलता अपने सतपुड़ा से मिलने की । एक अधीरता सतपुड़ा के अपनत्व के लिए ।यह बेकल हो जाना अपने अंचल से जीवन्त रिश्ता महसूस करने का ही प्रतिफल है ।आज वर्तमान समय में आधुनिक जीवन शैली के पास यह आत्मीयता का भंडार रिक्त है। स्नेह और लगाव के कोष खाली हैं ।यहां अपनत्व नहीं परायापन है ।अंचल तो क्या आजीविका देता देश भी आज अपना नहीं लगता ? यह मनोभाव के दारिद्रय का समय है । किसी एक दिन यह मनोभाव की ग़रीबी दूर होगी तब सतपुड़ा ,विन्ध्याचल सब अपने माने जायेंगे ।
