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जब
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खिल गये धरती आकाश
धूप के पैदा होते ही
बजने लगे नगाड़े घटाओं के
पानी के जनम पर
कण कण हो गये गतिवान
हवा के अवतरण पर
धूप ,पानी ,आकाश ,
और कण कण की गति से परे
क्या होगा उस वक्त
जब जन्म लेगा नया इंसान ।
( श्री प्रेमशंकर रघुवंशी जी के कविता संग्रह — “पकी फसल के बीच ” से उद्धृत )
कविता में एक कल्पना है ।एक जिज्ञासा का भाव है ।धूप जब धरती पर पहली बार उतरी तो धरती और आकाश प्रसन्नता से खिल गये । धूप याने उष्मा से भरा उजाला ,रोशनी, ताप , ठिठुरन से मुक्ति ।धूप के मायने कितने कितने गहरे हैं और उसका असर कितना प्राणदायक है ।यह धरती का कण कण और मनुष्य ही नहीं प्राणीमात्र की देह महसूस करती है । पृथ्वी पर उगती हरितिमा का तृण तृण यह अहसास अपनी खिलन अपनी गंध और रंग से व्यक्त करता है ।बादलों के भीतर बसा पानी जब धरती पर उमड़ा तो घटाओं ने उसके स्वागत भाव में नगाड़ों- सी आवाज और ध्वनि की पृथ्वी पर पानी का जन्म हुआ । धरती का कण – कण हवा से गतिवान हो गया ।हवा जब पृथ्वी पर चली तो तृण तृण और कण कण उसके साथ चंचल हो गये । पृथ्वी पर गति का पहला अहसास थी हवा । यह सब तो ब्रह्माण्ड के द्वारा अवतरित भौतिक तत्व हैं जिनसे प्राणीमात्र जीवन को महसूस करता है ।धूप , पानी ,आकाश और कण कण की गति के परे नया इंसान जब जन्म लेगा तब धरती पर क्या होगा ? इस को जानने की जिज्ञासा यहां ज्यादा बलवती है ।धरती पर मनुष्य नहीं ,आदमी नहीं वरन नये वैचारिक बोध वाला इंसान ? हवा से आदमी ने सीखा है गति से चलना । धूप से सीखा है ताप ,और आकाश से सीखी है उदारता ,व्यापकता अन्तहीन विस्तार , लेकिन मनुष्य ने यह सब सीख कर भी अपने भीतर इंसान नहीं पैदा किया ।भौतिक ब्रह्माण्ड के पंच तत्व पाकर भी अभी धरती पर इंसान के जन्म की प्रतीक्षा है ।यह “नया इंसान “के जन्म के पीछे किसी अवधारणा और चेतना का स्वरुप , छवि रची जा रही है । मनुष्य भौतिक उन्नति करते करते “मशीन मेन ” तक की रचना करने में सफल हो चुका है लेकिन यहां नया विचार किया जा रहा है — ” नया इंसान ” जो संवेदना से भरा हो , जिसमें करुणा की आद्रता हो , जिसमें सत्य के लिए बोलने का साहस हो , जिसमें न्याय की दृढ़ता हो , जिसमें निर्भयता हो , जिसमें मूल्य चेतना और नैतिकता हो जिसमें प्रेम हो ,अहिंसा हो त्याग हो ? क्या यही है वह — ” नया इंसान ” जिसके जन्म लेने का इंतजार है ।जिसके जन्म लेने से सृष्टि में बदलाव आयेगा जैसे बदल गये धरती और आकाश । कल्याण की भावना से उत्प्रोत है आकाश और धरती । यह तो मनुष्य ही है जो जितना संसाधन वान बना उतना ही वह प्रकृति को ब्रह्माण्ड को पंच तत्वों को प्रदूषण की ,नाश की ओर ले गया ? जिसने आसमान और धरती की निर्मलता को नुक़सान पहुंचाया ।पर्यावरण का दोहन किया और मनुष्य ने मनुष्य का शोषण किया और दास बनाया । विश्व विजय के सपने देखे और मानवता को अपने अहंकार के तले रौंदा ? आज मानवता और मानव मनुष्य के हिंसक रुप से हाहाकार कर रही है । इसीलिए तो जिज्ञासा है कि जब — नया इंसान ” जन्म लेगा तब धरती और आकाश में क्या परिवर्तन आयेगा ।आज मनुष्य हद दर्जे का स्वार्थ , विकृतियों से भरा हुआ है ।जब विकृति विहीन नया इंसान जन्मेगा तब क्या होगा ? यह जानना कितना कौतूहल भरा है । सचमुच तब धरती की स्थिति कैसी होगी ? हिंसा से मुक्त? प्रदूषण और लालच से रहित ? स्वार्थ और लोभ से विलग ? आपस में प्रेम करता हुआ — “नया इंसान ” आज के आदमी में भी यह बदलाव संभव है बस जरा सा बदलाव चाहिए ? क्या ? नफरत करना छोड़ दें , भेदभाव और छुआछूत मुक्त हो जाये ऊंच – नीच में बंटे नहीं ? आपस में भाईचारा और मानवीय चेतना को स्वीकार कर ले । अहिंसा का पालन करें और न्याय व्यवस्था के पक्ष में बोलने लगे राजनीतिक अमानवीयता को अस्वीकार करे । समाज के संताप ,दुख,पीड़ा का अनुभव करे और उसमें शामिल हो । यही तो है– “नया इंसान ” यांत्रिक नहीं ? अपने आप में डूबा नहीं ? समाज और जन के साथ अहसास साझा करता हुआ । भावनात्मक रुप से सूदूर नहीं करीब ,निकट ,शामिल इंसान ! यही और इसी तरह का — नया इंसान ! जब होगा तब मनुष्य का वैचारिक जन्म होगा । आज दैहिक जन्म हुआ है वैचारिक रुप से मानवीय चेतना से परिपूर्ण मानव ही नया इंसान हैं । वर्तमान में विचार हीन आदमी पशु वत है । वैचारिक रूप से सभ्यता और संस्कृति , मूल्यों और नैतिक मनुष्य ही नया इंसान हैं । यही नया इंसान की पहचान है । यही उसका परिचय है ।
विनीता रघुवंशी
